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Mantra Rig 01.152.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 152 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 22 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 92 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यु॒वं वस्त्रा॑णि पीव॒सा व॑साथे यु॒वोरच्छि॑द्रा॒ मन्त॑वो ह॒ सर्गा॑: अवा॑तिरत॒मनृ॑तानि॒ विश्व॑ ऋ॒तेन॑ मित्रावरुणा सचेथे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

युवं वस्त्राणि पीवसा वसाथे युवोरच्छिद्रा मन्तवो सर्गाः अवातिरतमनृतानि विश्व ऋतेन मित्रावरुणा सचेथे

 

The Mantra's transliteration in English

yuva vastrāi pīvasā vasāthe yuvor acchidrā mantavo ha sargā | avātiratam antāni viśva tena mitrāvaruā sacethe 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यु॒वम् वस्त्रा॑णि पी॒व॒सा व॒सा॒थे॒ इति॑ यु॒वोः अच्छि॑द्राः मन्त॑वः ह॒ सर्गाः॑ अव॑ अ॒ति॒र॒त॒म् अनृ॑तानि विश्वा॑ ऋ॒तेन॑ मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ स॒चे॒थे॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

yuvam | vastrāi | pīvasā | vasātheiti | yuvo | acchidrā | mantava | ha | sargā | ava | atiratam | antāni | viśvā | tena | mitrāvaruā | sacetheiti 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५२।०१

मन्त्रविषयः-

अथाध्यापकाध्याप्योपदेशकोपदेश्य विषयमाह।

अब एकसौ बावनवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में पढ़ाने, पढ़ने और उपदेश करने, उपदेश सुननेवालों के विषय को कहते हैं।

 

पदार्थः-

(युवम्) युवाम् (वस्त्राणि) शरीराच्छादकानि (पीवसा) स्थूलानि (वसाथे) आच्छादयथः (युवोः) (अच्छिद्रा) छिद्ररहिताः (मन्तवः) ज्ञातुं योग्याः (ह) खलु (सर्गाः) स्रष्टुं योग्याः (अव) (अतिरतम्) उल्लङ्घयतम् (अनृतानि) मिथ्याभाषणादीनि कर्माणि (विश्वा) सर्वाणि (ऋतेन) सत्येन (मित्रावरुणा) प्राणोदानवत्वर्त्तमानावध्यापकोपदेशकौ (सचेथे) संङ्गच्छेथे ॥१॥

हे (मित्रावरुणा) प्राण-उदान के समान वर्त्तमान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले ! जो (युवम्) तुम लोग (पीवसा) स्थूल (वस्त्राणि) वस्त्रों को (वसाथे) ओढ़ते हो वा जिन (युवोः) तुम्हारे (अच्छिद्राः) छेद-भेद रहित (मन्तवः) जानने योग्य (ह) ही पदार्थ (सर्गाः) रचने योग्य हैं, जो तुम (विश्वा) समस्त (अनृतानि) मिथ्याभाषण आदि कामों को (अवातिरतम्) उल्लङ्गते पार होते और (ऋतेन) सत्य से (सचेथे) सङ्ग करते हो वे तुम हम लोगों को क्यों न सत्कार करने योग्य होते हो ॥१॥

 

अन्वयः-

हे मित्रावरुणा यौ युवां पीवसा वस्त्राणि वसाथे ययोर्युवोरच्छिद्रा मन्तवो ह सर्गास्सन्ति यौ युवां विश्वानृतान्यवातिरतमृतेन सचेथे तावस्माभिः कुतो न सत्कर्त्तव्यौ भवथः ॥१॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैः सदैव स्थूलान्यच्छिद्राणि वस्त्राणि परिधाय विज्ञातुं योग्या दोषरहिता वस्त्रादयः पदार्था निर्मातव्याः। सदैव धृतेन सत्याचरणेनासत्याचरणानि त्यक्त्वा धर्मार्थकाममोक्षाः संसाधनीयाः ॥१॥

मनुष्यों को सदैव स्थूल छिद्ररहित वस्त्र पहन कर जानने के योग्य दोषरहित वस्त्र आदि पदार्थ निर्माण करने चाहियें और सदैव धारण किये हुए सत्याचरण से असत्याचरणों को छोड़ धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष अच्छे प्रकार सिद्ध करने चाहियें ॥१॥

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