Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 151‎ > ‎

Mantra Rig 01.151.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 151 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 21 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 88 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वा॑मृ॒ताय॑ के॒शिनी॑रनूषत॒ मित्र॒ यत्र॒ वरु॑ण गा॒तुमर्च॑थः अव॒ त्मना॑ सृ॒जतं॒ पिन्व॑तं॒ धियो॑ यु॒वं विप्र॑स्य॒ मन्म॑नामिरज्यथः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः अव त्मना सृजतं पिन्वतं धियो युवं विप्रस्य मन्मनामिरज्यथः

 

The Mantra's transliteration in English

ā vām tāya keśinīr anūata mitra yatra varua gātum arcatha | ava tmanā sjatam pinvata dhiyo yuva viprasya manmanām irajyatha 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वा॒म् ऋ॒ताय॑ के॒शिनीः॑ अ॒नू॒ष॒त॒ मित्र॑ यत्र॑ वरु॑ण गा॒तुम् अर्च॑थः अव॑ त्मना॑ सृ॒जत॑म् पिन्व॑तम् धियः॑ यु॒वम् विप्र॑स्य मन्म॑नाम् इ॒र॒ज्य॒थः॒

 

The Pada Paath - transliteration

ā | vām | tāya | keśinī | anūata | mitra | yatra | varua | gātum | arcatha | ava | tmanā | sjatam | pinvatam | dhiya | yuvam | viprasya | manmanām | irajyathaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।१५१।०६

मन्त्रविषयः

पुनस्तमेव विषयमाह ।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

 

पदार्थः

(आ) (वाम्) युवाम् (ऋताय) सत्याचाराय (केशिनीः) रश्मिमतीः (अनूषत) स्तुवत (मित्र) सखे (यत्र) (वरुण) वर (गातुम्) सत्यां स्तुतिम् (अर्चथः) सत्कुरुथः (अव) (त्मना) आत्मना (सृजतम्) निष्पादयतम् (पिन्वतम्) सिञ्चतम् (धियः) प्रज्ञाः (युवम्) युवाम् (विप्रस्य) मेधाविनः (मन्मनाम्) मन्यमानाम् (इरज्यथः) ऐश्वर्ययुक्तां कुरुथः ॥६॥

हे (मित्र) मित्र और (वरुण) श्रेष्ठ विद्वानो ! (यत्र) जहाँ (ऋताय) सत्याचरण के लिये (केशिनीः) चमक-दमकवाली सुन्दरी स्त्री (वाम्) तुम दोनों की (अनूषत) स्तुति करें वहाँ (युवम्) तुम दोनों (गातुम्) सत्य स्तुति को (आ, अर्चथः) अच्छे प्रकार प्रशंसित करते हो (त्मना) अपने से (विप्रस्य) धीरबुद्धि युक्त सज्जन की (धियः) उत्तम बुद्धियों को (अव, सृजतम्) निरन्तर उत्पन्न करो और (पिन्वतम्) उपदेश द्वारा सींचो (मन्मनाम्) और मान करती हुई को (इरज्यथः) ऐश्वर्ययुक्त करो ॥६॥

 

अन्वयः

हे मित्र वरुण च विद्वांसौ यत्रर्ताय केशिनीः सुन्दरस्त्रियो वां युवामनूषत तत्र युवं गातुमार्चथः । त्मना विप्रस्य धियोवसृजतं पिन्वतं च मन्मनामिरज्यथः ॥६॥

 

 

भावार्थः

या इह प्रशंसिताः स्त्रियो ये च पुरुषास्ते स्वसदृशैस्सह संयुज्यन्तां ब्रह्मचर्य्येण विद्यया विज्ञानमुन्नीयैश्वर्यं वर्द्धयन्तु ॥६॥

जो यहाँ प्रशंसायुक्त स्त्रियाँ और जो पुरुष हैं वे अपने समान पुरुष-स्त्रियों के साथ संयोग करें, ब्रह्मचर्य से और विद्या से विशेष ज्ञान की उन्नति कर ऐश्वर्य को बढ़ावें ॥६॥







Comments