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Mantra Rig 01.151.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 151 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 20 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 87 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

म॒ही अत्र॑ महि॒ना वार॑मृण्वथोऽरे॒णव॒स्तुज॒ सद्म॑न्धे॒नव॑: स्वर॑न्ति॒ ता उ॑प॒रता॑ति॒ सूर्य॒मा नि॒म्रुच॑ उ॒षस॑स्तक्व॒वीरि॑व

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मही अत्र महिना वारमृण्वथोऽरेणवस्तुज सद्मन्धेनवः स्वरन्ति ता उपरताति सूर्यमा निम्रुच उषसस्तक्ववीरिव

 

The Mantra's transliteration in English

mahī atra mahinā vāram ṛṇvatho 'reavas tuja ā sadman dhenava | svaranti tā uparatāti sūryam ā nimruca uasas takvavīr iva 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

म॒ही अत्र॑ म॒हि॒ना वार॑म् ऋ॒ण्व॒थः॒ अ॒रे॒णवः॑ तुजः॑ सद्म॑न् धे॒नवः॑ स्वर॑न्ति ताः उ॒प॒रऽता॑ति सूर्य॑म् नि॒ऽम्रुचः॑ उ॒षसः॑ त॒क्व॒वीःऽइ॑व

 

The Pada Paath - transliteration

mahī | atra | mahinā | vāram | ṛṇvatha | areava | tuja | ā | sadman | dhenava | svaranti | tā | upara-tāti | sūryam | ā | ni-mruca | uasa | takvavī-iva 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।१५१।०५

मन्त्रविषयः

पुनस्तमेव विषयमाह ।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

 

पदार्थः

(मही) महत्यां मह्याम् (अत्र) (महिना) महिम्ना (वारम्) वर्त्तुमर्हम् (ऋण्वथः) प्राप्नुथः (अरेणवः) दुष्टानप्राप्ताः (तुजः) आदत्ताः (आ) (सद्मन्) सद्मनि गृहे (धेनवः) या धयन्ति पाययन्ति ताः (स्वरन्ति) (ताः) (उपरताति) उपराणां मेघानामवकाशवत्यन्तरिक्षे (सूर्यम्) (आ) (निम्रुचः) नितरां गच्छन्तीः (उषसः) प्रभातान् (तक्ववीरिव) यस्तकान् सेनाजनान् व्याप्नोति तद्वत् ॥५॥

हे पढ़ाने और उपदेश करनेवाले सज्जनो ! तुम दोनों (तक्ववीरिव) जो सेनाजनों को व्याप्त होता उसके समान (अत्र) इस (मही) पृथिवी में (महिना) बड़प्पन से (उपरताति) मेघों के अवकाशवाले अर्थात् मेघ जिसमें आते-जाते उस अन्तरिक्ष में (सूर्यम्) सूर्यमण्डल को (आ, निम्रुचः) मर्यादा माने निरन्तर गमन करती हुई (उषसः) प्रभात वेलाओं के समान (अरेणवः) जो दुष्टों को नहीं प्राप्त (तुजः) सज्जनों ने ग्रहण की हुई (धेनवः) जो दुग्ध पिलाती हैं वे गौयें (सद्मन्) अपने गोड़ों में (वारम्) स्वीकार करने योग्य (आ, स्वरन्ति) सब ओर से शब्द करती हैं (ताः) उनको (ऋण्वथः) प्राप्त होओ ॥५॥

 

अन्वयः

हे अध्यापकोपदेशकौ युवां तक्ववीरिवात्र मही महिना उपरताति । सूर्यमा निम्रुच उषस इव या अरेणवस्तुजो धेनवः सद्मन्वारमास्वरन्ति ता ऋण्वथः ॥५॥

 

 

भावार्थः

अत्रोपमालङ्कारः । यथा दुग्धदात्र्यो गावः सर्वान् प्रीणयन्ति तथाऽध्यापकोदेशका विद्यासुशिक्षाः प्रदाय सर्वान् सुखयेयुः ॥५॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे दूध देनेवाली गौयें सब प्राणियों को प्रसन्न करती हैं, वैसे पढ़ाने और उपदेश करनेवाले जन विद्या और उत्तम शिक्षा को अच्छे प्रकार देकर सब मनुष्यों को सुखी करें ॥५॥








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