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Mantra Rig 01.150.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 150 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 19 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 82 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- भुरिग्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

च॒न्द्रो वि॑प्र॒ मर्त्यो॑ म॒हो व्राध॑न्तमो दि॒वि प्रप्रेत्ते॑ अग्ने व॒नुष॑: स्याम

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

चन्द्रो विप्र मर्त्यो महो व्राधन्तमो दिवि प्रप्रेत्ते अग्ने वनुषः स्याम

 

The Mantra's transliteration in English

sa candro vipra martyo maho vrādhantamo divi | pra-pret te agne vanua syāma 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः च॒न्द्रः वि॒प्र॒ मर्त्यः॑ म॒हः व्राध॑न्ऽतमः दि॒वि प्रऽप्र॑ इत् ते॒ अ॒ग्ने॒ व॒नुषः॑ स्याम

 

The Pada Paath - transliteration

sa | candra | vipra | martya | maha | vrādhan-tama | divi | pra-pra | it | te | agne | vanua | syāma 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।१५०।०३

मन्त्रविषयः

पुनस्तमेव विषयमाह ।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

 

पदार्थः

(सः) (चन्द्रः) आह्लादकारकः (विप्र) मेधाविन् (मर्त्यः) मनुष्यः (महः) महान् (व्राधन्तमः) अतिशयेन वर्द्धमानः (दिवि) (प्रप्र) (इत्) एव (ते) तव (अग्ने) विद्वन् (वनुषः) संविभाजकस्य (स्याम) भवेम ॥३॥

हे (अग्ने) विद्वान् ! जैसे हम लोग (वनुषः) अलग सबको बाँटनेवाले (ते) आपके उपकार करनेवाले (प्रप्र, इत्, स्याम) उत्तम ही प्रकार से होवें । वा हे (विप्र) धीर बुद्धिवाले जन जैसे (सः) वह (मर्त्यः) मनुष्य (व्राधन्तमः) अतीव उन्नति को प्राप्त जैसे (महः) बड़ा (चन्द्रः) चन्द्रमा (दिवि) आकाश में वर्त्तमान है, वैसे तू भी अपना वर्त्ताव रख ॥३॥

 

अन्वयः

हे अग्ने विद्वन् यथा वयं वनुषस्ते तवोपकारकाः प्रप्रेत् स्याम । हे विप्र यथा स मर्त्यो व्राधन्तमो महश्चन्द्रो दिवीव वर्त्तते तथा त्वं वर्त्तस्व ॥३॥

 

 

भावार्थः

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यथा पृथिव्यादिपदार्थज्ञा विद्वांसो विद्याप्रकाशे प्रवर्त्तन्ते तथेतरैरपि वर्त्तितव्यम् ॥३॥

अस्मिन् सूक्ते विद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥

इति पञ्चाशदुत्तरं शततमं सूक्तमेकोनविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे पृथिव्यादि पदार्थों को जाने हुए विद्वान् जन विद्याप्रकाश में प्रवृत्त होते हैं, वैसे और जनों को भी वर्त्ताव रखना चाहिये ॥३॥

इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥

यह एक सौ पचासवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥









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