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Mantra Rig 01.147.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 147 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 16 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 68 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यो नो॑ अग्ने॒ अर॑रिवाँ अघा॒युर॑राती॒वा म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑ मन्त्रो॑ गु॒रुः पुन॑रस्तु॒ सो अ॑स्मा॒ अनु॑ मृक्षीष्ट त॒न्वं॑ दुरु॒क्तैः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यो नो अग्ने अररिवाँ अघायुररातीवा मर्चयति द्वयेन मन्त्रो गुरुः पुनरस्तु सो अस्मा अनु मृक्षीष्ट तन्वं दुरुक्तैः

 

The Mantra's transliteration in English

yo no agne ararivām̐ aghāyur arātīvā marcayati dvayena | mantro guru punar astu so asmā anu mkīṣṭa tanva duruktai 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यः नः॒ अ॒ग्ने॒ अर॑रिऽवान् अ॒घ॒ऽयुः अ॒रा॒ति॒ऽवा म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑ मन्त्रः॑ गु॒रुः पुनः॑ अ॒स्तु॒ सः अ॒स्मै॒ अनु॑ मृ॒क्षी॒ष्ट॒ त॒न्व॑म् दुः॒ऽउ॒क्तैः

 

The Pada Paath - transliteration

ya | na | agne | arari-vān | agha-yu | arāti-vā | marcayati | dvayena | mantra | guru | puna | astu | sa | asmai | anu | mkīṣṭa | tanvam | du-uktaiḥ 



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१४७।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यः) (नः) अस्मानस्माकं वा (अग्ने) विद्वन् (अररिवान्) प्राप्नुवन् (अघायुः) आत्मनोऽघमिच्छुः (अरातीवा) यो अरातिरिवाचरति (मर्चयति) उच्चरती (द्वयेन) द्विविधेन कर्मणा (मन्त्रः) विचारवान् (गुरुः) उपदेष्टा (पुनः) (अस्तु) भवतु (सः) (अस्मै) (अनु) (मृक्षीष्ट) शोधयतु (तन्वम्) शरीरम् (दुरुक्तैः) दुष्टैरुक्तैः ॥

हे (अग्ने) विद्वान् ! (यः) जो (अररिवान्) दुःखों को प्राप्त करता हुआ (अघायुः) अपने को अपराध की इच्छा करनेवाला (अरातीवा) न देनेवाला जन के समान आचरण करता (द्वयेन) दो प्रकार के कर्म से वा (दुरुक्तैः) दुष्ट उक्तियों से (नः) हम लोगों को (मर्चयति) कहता है उससे जो हमारे (तन्वम्) शरीर को (अनु, मृक्षीष्ट) पीछे शोधे (सः) वह हमारा और (अस्मै) उक्त व्यवहार के लिये (पुनः) बार-बार (मन्त्रः) विचारशील (गुरुः) उपदेश करनेवाला (अस्तु) होवे

 

अन्वयः-

हे अग्ने यो अररिवानघायुररातिवा द्वयेन दुरुक्त्तै र्नोस्मान्मर्चयति ततो यो नस्तन्वमनुमृक्षीष्ट सोऽस्माकमस्मै पुनर्मन्त्रो गुरुरस्तु ॥

 

 

भावार्थः-

ये मनुष्याणां मध्ये दुष्टं शिक्षन्ते ते त्याज्याः। ये सत्यं शिक्षन्ते ते माननीयास्सन्तु

जो मनुष्यों के बीच दुष्ट शिक्षा देते वा दुष्टों को सिखाते हैं वे छोड़ने योग्य और जो सत्य शिक्षा देते वा सत्य वर्त्ताव वर्त्तनेवाले को सिखाते वे मानने के योग्य होवें

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