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Mantra Rig 01.146.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 146 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 15 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स॒मा॒नं व॒त्सम॒भि सं॒चर॑न्ती॒ विष्व॑ग्धे॒नू वि च॑रतः सु॒मेके॑ अ॒न॒प॒वृ॒ज्याँ अध्व॑नो॒ मिमा॑ने॒ विश्वा॒न्केताँ॒ अधि॑ म॒हो दधा॑ने

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

समानं वत्समभि संचरन्ती विष्वग्धेनू वि चरतः सुमेके अनपवृज्याँ अध्वनो मिमाने विश्वान्केताँ अधि महो दधाने

 

The Mantra's transliteration in English

samāna vatsam abhi sacarantī vivag dhenū vi carata sumeke | anapavjyām̐ adhvano mimāne viśvān ketām̐ adhi maho dadhāne 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स॒मा॒नम् व॒त्सम् अ॒भि स॒ञ्चर॑न्ती॒ इति॑ स॒म्ऽचर॑न्ती विष्व॑क् धे॒नू इति॑ वि च॒र॒तः॒ सु॒मेक्के॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑ अ॒न॒प॒ऽवृ॒ज्यान् अध्व॑नः मिमा॑ने॒ इति॑ विश्वा॑न् केता॑न् अधि॑ म॒हः दधा॑ने॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

samānam | vatsam | abhi | sañcarantī itisam-carantī | vivak | dhenū iti | vi | carata | sumeke itisu-meke | anapa-vjyān | adhvana | mimāneiti | viśvān | ketān | adhi | maha | dadhāneiti 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१४६।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(समानम्) तुल्यम् (वत्सम्) वत्सवद्वर्त्तमानोऽहोरात्रः (अभि) अभितः (संचरन्ती) सम्यग् गच्छन्ती (विष्वक्) विषुं व्याप्तिमञ्चति (धेनू) धेनुरिव वर्त्तमाने (वि) (चरतः) (सुमेके) सुष्ठुमेकः प्रक्षेपो ययोस्तौ (अनपवृज्यान्) अपवर्जितुमनर्हान् (अध्वनः) मार्गस्य (मिमाने) निर्माणकर्तृणी (विश्वान्) समग्रान् (केतान्) बोधान् (अधि) (महः) महतः (दधाने) ॥३॥

हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे सूर्यलोक और भूमण्डल दोनों (समानम्) तुल्य (वत्सम्) बछड़े के समान वर्त्तमान दिन-रात्रि को (अभि, सं, चरन्ति) सब ओर से अच्छे प्रकार प्राप्त होते हुए (सुमेके) सुन्दर जिनका त्याग करना (अध्वनः) मार्ग से (अनपवृज्यान्) न दूर करने योग्य पदार्थों को (मिमाने) बनावट (=रचना) करनेवाले (महः) बड़े बड़े (विश्वान्) समग्र (केतान्) बोधों को (अधि, दधाने) अधिकता से धारण करते हुए (धेनू) गौओं के समान (विष्वक्, वि, चरतः) सब ओर से विचर रहे हैं वैसे इन्हें जान, पक्षपात को छोड़, सब कामों को पूरा करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यूयं यथा द्यावापृथिव्यौ समानं वत्समभिसंचरन्ती सुमेकेऽध्वनोऽनपवृज्यान् मिमाने महो विश्वान् केतानधि दधाने धेनूइव विष्वग् विचरतः तथेमे विदित्वा पक्षपातं विहाय सर्वेषां कामान् पूरयत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः सूर्यवत् न्यायगुणाकर्षकप्रकाशका नानाविधमार्गान् निर्मिमाणा धेनूवत् सर्वान्पुष्यन्तः समग्रा विद्या धरन्ति ते दुःखरहिताः स्युः ॥३॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान न्याय गुणों के आकर्षण और प्रकाश [*] करनेवाले, नानाविध मार्गों का निर्माण करते हुए धेनु के समान सबकी पुष्टि करते हुए समग्र विद्याओं को धारण करते हैं वे दुःखरहित होते हैं ॥३॥ [* गुणों को आकर्षण कानेवालों का प्रकाश- हस्तलेख ॥ सं० ] ॥

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