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Mantra Rig 01.144.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 144 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 13 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 48 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

एति॒ प्र होता॑ व्र॒तम॑स्य मा॒ययो॒र्ध्वां दधा॑न॒: शुचि॑पेशसं॒ धिय॑म् अ॒भि स्रुच॑: क्रमते दक्षिणा॒वृतो॒ या अ॑स्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं ह॒ निंस॑ते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

एति प्र होता व्रतमस्य माययोर्ध्वां दधानः शुचिपेशसं धियम् अभि स्रुचः क्रमते दक्षिणावृतो या अस्य धाम प्रथमं निंसते

 

The Mantra's transliteration in English

eti pra hotā vratam asya māyayordhvā dadhāna śucipeśasa dhiyam | abhi sruca kramate dakiāvto yā asya dhāma prathama ha nisate

 

The Pada Paath (Sanskrit)

एति॑ प्र होता॑ व्र॒तम् अ॒स्य॒ मा॒यया॑ ऊ॒र्ध्वाम् दधा॑नः शुचि॑ऽपेशसम् धिय॑म् अ॒भि स्रुचः॑ क्र॒म॒ते॒ द॒क्षि॒णा॒ऽआ॒वृतः॑ याः अ॒स्य॒ धाम॑ प्र॒थ॒मम् ह॒ निंस॑ते

 

The Pada Paath - transliteration

eti | pra | hotā | vratam | asya | māyayā | ūrdhvām | dadhāna | śuci-peśasam | dhiyam | abhi | sruca | kramate | dakiāāvta | yā | asya | dhāma | prathamam | ha | nisate 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१४४।०१

मन्त्रविषयः-

अथाध्यापकोपदेशकविषयमाह।

अब एकसौ चवालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेश करनेवालों के विषय को कहते हैं।

 

पदार्थः-

(एति) प्राप्नोति (प्र) (होता) सद्गुणग्रहीता (व्रतम्) सत्याचरणशीलम् (अस्य) शिक्षकस्य (मायया) प्रज्ञया (ऊर्ध्वाम्) उत्कृष्टाम् (दधानः) (शुचिपेशसम्) पवित्ररूपाम् (धियम्) प्रज्ञां कर्म वा (अभि) (स्रुचः) विज्ञानयुक्ताः (क्रमते) प्राप्नोति (दक्षिणावृतः) या दक्षिणां वृण्वन्ति (याः) (अस्य) (धाम) दधति यस्मिंस्तत् (प्रथमम्) (ह) (निंसते) चुम्बति ॥१॥

जो (होता) सद्गुणों का ग्रहण करनेवाला पुरुष (मायया) उत्तम बुद्धि से (अस्य) इस शिक्षा करनेवाले के (व्रतम्) सत्याचरण शील को (ऊर्ध्वाम्) और उत्तम (शुचिपेशसम्) पवित्र (धियम्) बुद्धि वा कर्म को (दधानः) धारण करता हुआ (प्र, क्रमते) व्यवहारों में चलता है वा (याः) जो (अस्य) इसकी (स्रुचः) विज्ञानयुक्त (दक्षिणावृतः) दक्षिणा का आच्छादन करनेवाली बुद्धि हैं उनको और (प्रथमम्) प्रथम (धाम) धाम को (निंसते) जो प्रीति को पहुंचाता है (ह) वही अत्यन्त बुद्धिमान् होता है ॥१॥

 

अन्वयः-

यो होता माययाऽस्य व्रतमूध्वाँ शुचिपेशसं धियं दधानः प्रक्रमते या अस्य स्रुचो दक्षिणावृतो धियः प्रथमं धाम निंसते ताअभ्येति स ह प्राज्ञतमो जायते ॥१॥

 

 

भावार्थः-

ये मनुष्या आप्तस्य विदुष उपदेशाध्यापनाभ्यां विद्यायुक्तां बुद्धिमाप्नुवन्ति ते सुशीला जायन्ते ॥१॥   

जो मनुष्य शास्त्रवेत्ता विद्वान् के उपदेश और पढ़ाने से विद्यायुक्त बुद्धि को प्राप्त होते हैं वे सुशील होते हैं ॥१॥

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