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Mantra Rig 01.137.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 137 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 1 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 24 of Anuvaak 20 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- परुच्छेपो दैवोदासिः

देवता (Devataa) :- मित्रवरुणौ

छन्द: (Chhand) :- विराडतिशक्वरी

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

इ॒म या॑त॒मिन्द॑व॒: सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः सु॒तासो॒ दध्या॑शिरः उ॒त वा॑मु॒षसो॑ बु॒धि सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑: सु॒तो मि॒त्राय॒ वरु॑णाय पी॒तये॒ चारु॑ॠ॒ताय॑ पी॒तये॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

इम यातमिन्दवः सोमासो दध्याशिरः सुतासो दध्याशिरः उत वामुषसो बुधि साकं सूर्यस्य रश्मिभिः सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुॠताय पीतये

 

The Mantra's transliteration in English

ima ā yātam indava somāso dadhyāśira sutāso dadhyāśira | uta vām uaso budhi sāka sūryasya raśmibhi | suto mitrāya varuāya pītaye cārur tāya pītaye

 

The Pada Paath (Sanskrit)

इ॒मे या॒त॒म् इन्द॑वः सोमा॑सः दधि॑ऽआशिरः सु॒तासः॑ दधि॑ऽआशिरः उ॒त वा॒म् उ॒षसः॑ बु॒धि सा॒कम् सूर्य॑स्य र॒श्मिऽभिः॑ सु॒तः मि॒त्राय वरु॑णाय पी॒तये॑ चारुः॑ ऋ॒ताय॑ पी॒तये॑

 

The Pada Paath - transliteration

ime | ā | yātam | indava | somāsa | dadhi-āśira | sutāsa | dadhi-āśira | uta | vām | uasa | budhi | sākam | sūryasya | raśmi-bhi | suta | mitrāya | varuāya | pītaye | cāru | tāya | pītaye 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१३७।०२

मन्त्रविषयः-

अथौषध्यादिरसपानविषयमाह।

अब ओषधि आदि पदार्थों के रस के पीने आदि के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(इमे) (आ) (यातम्) (इन्दवः) आर्द्रीभूताः (सोमासः) दिव्यौषधिरसाः (दध्याशिरः) ये दध्ना अश्यन्ते ते (सुतासः) संपादिताः (दध्याशिरः) (उत) अपि (वाम्) युवाभ्याम् (उषसः) (बुधि) बोधे। अत्र संपदादिलक्षणः क्विप्। (साकम्) सह (सूर्य्यस्य) (रश्मिभिः) किरणैः (सुतः) अभिनिष्पादितः (मित्राय) सुहृदे (वरुणाय) वराय (पीतये) पानाय (चारुः) सुन्दरः (ऋताय) सत्याचाराय (पीतये) पानाय ॥२॥

हे पढ़ाने वा पढ़नेवाले ! जो (चारुः) सुन्दर (मित्राय) मित्र के लिये (पीतये) पीने को और (वरुणाय) उत्तम जन के लिये (ऋताय) सत्याचरण और (पीतये) पीने को (उषसः) प्रभात वेला के (बुधि) प्रबोध में सूर्यमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ ओषधियों का रस (सुतः) सब ओर से सिद्ध किया गया है उसको तुम (आयातम्) प्राप्त होओ तथा (वाम्) तुम्हारे लिये (इमे) ये (इन्दवः) गीले वा टपकते हुए (सोमासः) दिव्य ओषधियों के रस और (दध्याशिरः) जो पदार्थ दही के साथ भोजन किये जाते उनके समान (दध्याशिरः) दही से मिले हुए भोजन (सुतासः) सिद्ध किये गये हैं (उत) उन्हें भी प्राप्त होओ ॥२॥

 

अन्वयः-

हेऽध्यापकाऽध्येतारौ यश्चारुर्मित्राय पीतये वरुणायर्ताय पीतये चोषसो बुधि सूर्यस्य रश्मिभिः साकं सोमस्सुतस्तं युवामायातम्। वां य इम इन्दवः सोमासो दध्याशिरइव दध्याशिरस्सुतासः सन्ति तानुताप्यायातम् ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैरस्मिन्संसारे यावन्तो रसा ओषधयश्च निर्मातव्यास्तावन्तः सर्वे सौहार्दोत्तमकर्मसेवनायालस्यादिनाशाय च समर्पणीयाः ॥२॥

मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में जितने रस वा ओषधियों को सिद्ध करें उन सबको मित्रपन और उत्तम कर्म सेवने को तथा आलस्यादि दोषों के नाश करने को समर्पण करें ॥२॥

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