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Mantra Rig 01.136.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 136 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 26 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 19 of Anuvaak 20 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- परुच्छेपो दैवोदासिः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- भुरिगष्टिः

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑म॒: सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अयं मित्राय वरुणाय शंतमः सोमो भूत्ववपानेष्वाभगो देवो देवेष्वाभगः तं देवासो जुषेरत विश्वे अद्य सजोषसः तथा राजाना करथो यदीमह ऋतावाना यदीमहे

 

The Mantra's transliteration in English

ayam mitrāya varuāya śatama somo bhūtv avapānev ābhago devo devev ābhaga | ta devāso juerata viśve adya sajoasa | tathā rājānā karatho yad īmaha tāvānā yad īmahe 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒यम् मि॒त्राय॑ वरु॑णाय॑ शम्ऽत॑मः सोमः॑ भू॒तु॒ अ॒व॒ऽपाने॑षु आऽभ॑गः दे॒वः दे॒वेषु॑ आऽभ॑गः तम् दे॒वासः॑ जु॒षे॒र॒त॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒ऽजोष॑सः तथा॑ रा॒जा॒ना॒ क॒र॒थः॒ यत् ईम॑हे ऋत॑ऽवाना यत् ईम॑हे

 

The Pada Paath - transliteration

ayam | mitrāya | varuāya | śam-tama | soma | bhūtu | ava-pāneu | ābhaga | deva | deveu | ābhaga | tam | devāsa | juerata | viśve | adya | sa-joasa | tathā | rājānā | karatha | yat | īmahe | ta-vānā | yat | īmahe 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१३६।०४

मन्त्रविषयः-

पुनरत्र मनुष्यैः कथं वर्त्तितव्यमित्याह।

फिर इस संसार में मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(अयम्) (मित्राय) सर्वसुहृदे (वरुणाय) सर्वोत्कृष्टाय (शंतमः) अतिशयेन सुखकारी (सोमः) सुखैश्वर्यकारको न्यायः (भूतु) भवतु। अत्र शपो लुक्, भसुवोस्तिङीति गुणप्रतिषेधः। (अवपानेषु) अत्यन्तेषु रक्षणेषु (आभगः) समस्तैश्वर्यः (देवः) सुखप्रदाता (देवेषु) दिव्येषु विद्वत्सु गुणेषु वा (आभगः) समस्तसौभाग्यः (तम्) (देवासः) विद्वांसः (जुषेरत) सेवेरन्प्रीणन्तु वा। अत्र बहुलं छन्दसीति रुडागमः। (विश्वे) सर्वे (अद्य) (सजोषसः) समानं धर्मं सेवमानाः (तथा) (राजाना) प्रकाशमानौ सभासेनेशौ (करथः) कुर्य्याताम् (यत्) यम् (ईमहे) याचामहे (ऋतावाना) ऋतस्य सत्यस्य सम्बन्धिनौ। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (यत्) यम् (ईमहे) ॥४॥

जैसे (अयम्) यह (अवपानेषु) अत्यन्त रक्षा आदि व्यवहारों में (मित्राय) सबके मित्र और (वरुणाय) सबसे उत्तम के लिये (आभगः) समस्त ऐश्वर्य (शन्तमः) अतीव सुख (सोमः) और सुखयुक्त ऐश्वर्य्य करनेवाला न्याय (भूतु) हो वैसे जो (देवः) सुख अच्छे प्रकार देनेवाला (देवेषु) दिव्य विद्वानों और दिव्य गुणों में (आभगः) समस्त सौभाग्य हो (तम्) उसको (अद्य) आज (सजोषसः) समान धर्म का सेवन करनेवाले (विश्वे) समस्त (देवासः) विद्वान् जन (जुषेरत) सेवन करें वा उससे प्रीति करें और जैसे (यत्) जिस व्यवहार को (राजाना) प्रकाशमान् सभा सेनापति (करथः) करें (तथा) वैसे उस व्यवहार को हम लोग (ईमहे) मांगते और जैसे (ऋतावाना) सत्य का सम्बन्ध करनेवाले (यत्) जिस काम को करें वैसे उसको हम लोग भी (ईमहे) याचें मांगें ॥४॥

 

अन्वयः-

यथाऽयमवपानेषु मित्राय वरुणायाभगः शंतमः सोमो भूतु तथा यो देवो देवेष्वाभगो भवतु तमद्य सजोषसो विश्वे देवासो जुषेरत यथा यद्यं राजाना करथस्तथा तं वयमीमहे यथा ऋतावाना यद्यं करथस्तथा तं वयमीमहे ॥४॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। इह संसारे यथाऽऽप्ता धर्म्येण व्यवहारेणैश्वर्यमुन्नीय सर्वेषामुपकारके कर्मणि व्ययन्ति यथा सत्यं जिज्ञासवो धार्मिकान् विदुषो याचते तथा सर्वे मनुष्याः स्वमैश्वर्य सत्कर्मणि व्ययेयुः। विद्वद्भ्यो विद्याश्च याचेरन् ॥४॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। इस संसार में जैसे शास्त्रवेत्ता विद्वान् धर्म के अनुकूल व्यवहार (से) ऐश्वर्य्य की उन्नति कर सबके उपकार करनेहारे काम में खर्च करते वा जैसे सत्य व्यवहार को जानने की इच्छा करनेवाले धार्मिक विद्वानों को याचते अर्थात् उनसे अपने प्रिय पदार्थ को मांगते वैसे सब मनुष्य अपने ऐश्वर्य को अच्छे काम में खर्च करें और विद्वान् महाशयों से विद्याओं की याचना करें ॥४॥

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