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Mantra Rig 01.135.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 135 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 25 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 14 of Anuvaak 20 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- परुच्छेपो दैवोदासिः

देवता (Devataa) :- वायु:

छन्द: (Chhand) :- निचृदष्टिः

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अत्राह॒ तद्व॑हेथे॒ मध्व॒ आहु॑तिं॒ यम॑श्व॒त्थमु॑प॒तिष्ठ॑न्त जा॒यवो॒ऽस्मे ते स॑न्तु जा॒यव॑: सा॒कं गाव॒: सुव॑ते॒ पच्य॑ते॒ यवो॒ ते॑ वाय॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवो॒ नाप॑ दस्यन्ति धे॒नव॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अत्राह तद्वहेथे मध्व आहुतिं यमश्वत्थमुपतिष्ठन्त जायवोऽस्मे ते सन्तु जायवः साकं गावः सुवते पच्यते यवो ते वाय उप दस्यन्ति धेनवो नाप दस्यन्ति धेनवः

 

The Mantra's transliteration in English

atrāha tad vahethe madhva āhuti yam aśvattham upatiṣṭhanta jāyavo 'sme te santu jāyava | sāka gāva suvate pacyate yavo na te vāya upa dasyanti dhenavo nāpa dasyanti dhenava ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अत्र॑ अह॑ तत् व॒हे॒थे॒ इति॑ मध्वः॑ आऽहु॑तिम् यम् अ॒श्व॒त्थम् उ॒प॒ऽतिष्ठ॑न्त जा॒यवः॑ अ॒स्मे इति॑ ते स॒न्तु॒ जा॒यवः॑ सा॒कम् गावः॑ सुव॑ते पच्य॑ते यवः॑ ते॒ वा॒यो॒ इति॑ उप॑ द॒स्य॒न्ति॒ धे॒नवः॑ अप॑  द॒स्य॒न्ति॒  धे॒नवः॑ ॥

 

The Pada Paath - transliteration

atra | aha | tat | vahetheiti | madhva | āhutim | yam | aśvattham | upa-tiṣṭhanta | jāyava | asme iti | te | santu | jāyava | sākam | gāva | suvate | pacyate | yava | na | te | vāyo iti | upa | dasyanti | dhenava | na | apa | dasyanti | dhenavaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१३५।०८

मन्त्रविषयः-

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह।

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

  

पदार्थः-

(अत्र) (अह) किल (तत्) (वहेथे) प्रापयतः (मध्वः) मधुरस्य विज्ञानस्य (आहुतिम्) समन्ताद्ग्रहणम् (यम्) (अश्वत्थम्) पिष्पलमिव (उपतिष्ठन्त) उपतिष्ठन्तु (जायवः) जयशीलाः (अस्मे) अस्माकम् (ते) (सन्तु) (जायवः) जेतारः शूराः (साकम्) सह (गावः) धेनवः (सुवते) गर्भान् विमुञ्चन्ति (पच्यते) परिपक्वो भवति (यवः) मिश्रामिश्रव्यवहारः (न) इव (ते) तव (वायो) वायुवद्बलयुक्त (उप) (दस्यन्ति) क्षयन्ति (धेनवः) (न) निषेधे (अप) (दस्यन्ति) (धेनवः) वाण्यः

हे (वायो) पवन के समान विद्वान् ! जो पढ़ाने और उपदेश करनेवाले (अत्राह) यहीं निश्चय से (तत्) उस विषय को (वहेथे) प्राप्त कराते वा (अश्वत्थम्) जैसे पीपलवृक्ष को पखेरू वैसे (जायवः) जीतनेहारे (यम्) जिन आपके (उपतिष्ठन्त) समीप स्थित हों और (मध्वः) मधुर विज्ञान के (आहुतिम्) सब प्रकार ग्रहण करने को उपस्थित हों (ते) वे (अस्मे) हम लोगों के बीच (जायवः) जीतनेहारे शूर (सन्त) हो, ऐसे अच्छे प्रकार आचरण करते हुए (ते) आपकी (गावः) गौयें (साकम्) साथ (सुवते) विआती (यवः) मिला वा पृथक्-पृथक् व्यवहार साथ (पच्यते) सिद्ध होता तथा (धेनवः) गौयें जैसे (अप, दस्यन्ति) नष्ट नहीं होती (न) वैसे (धेनवः) वाणी (न, उप, दस्यन्ति) नहीं नष्ट होतीं

 

अन्वयः-

हे वायो विद्वन् यावध्यापकोपदेशकावत्राऽह तद्वहेथे अश्वत्थं पक्षिण इव जायवो यं त्वामुपतिष्ठन्त मध्व आहुतिं चोपतिष्ठन्त तेऽस्मे जायवः सन्तु। एवं समाचरतस्ते गावः साकं सुवते यवः साकं पच्यते धेनवो नापदस्यन्ति धेनवो नोपदस्यन्ति ॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यदि सर्वैर्मनुष्यैः श्रेष्ठमनुष्याणां संगस्थकामना परस्परस्मिन्प्रीतिः क्रियेत तर्हि तेषां विद्याबलह्रासो भेदबुद्धिश्च नोपजायेत

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सब मनुष्यों से श्रेष्ठ मनुष्यों के सङ्ग की कामना और आपस में प्रीति की जाय तो उनकी विद्या बल की हानि और भेद बुद्धि न उत्पन्न हो

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