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Mantra Rig 01.130.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 130 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 18 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 35 of Anuvaak 19 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- परुच्छेपो दैवोदासिः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिगष्टिः

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वं वृथा॑ न॒द्य॑ इन्द्र॒ सर्त॒वेऽच्छा॑ समु॒द्रम॑सृजो॒ रथाँ॑ इव वाजय॒तो रथाँ॑ इव इ॒त ऊ॒तीर॑युञ्जत समा॒नमर्थ॒मक्षि॑तम् धे॒नूरि॑व॒ मन॑वे वि॒श्वदो॑हसो॒ जना॑य वि॒श्वदो॑हसः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वं वृथा नद्य इन्द्र सर्तवेऽच्छा समुद्रमसृजो रथाँ इव वाजयतो रथाँ इव इत ऊतीरयुञ्जत समानमर्थमक्षितम् धेनूरिव मनवे विश्वदोहसो जनाय विश्वदोहसः

 

The Mantra's transliteration in English

tva vthā nadya indra sartave 'cchā samudram asjo rathām̐ iva vājayato rathām̐ iva | ita ūtīr ayuñjata samānam artham akitam | dhenūr iva manave viśvadohaso janāya viśvadohasa 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वम् वृथा॑ न॒द्यः॑ इ॒न्द्र॒ सर्त॑वे अच्छ॑ स॒मु॒द्रम् अ॒सृ॒जः॒ रथा॑न्ऽइव वा॒ज॒य॒तः रथा॑न्ऽइव इ॒तः ऊ॒तीः अ॒यु॒ञ्ज॒त॒ स॒मा॒नम् अर्थ॑म् अक्षि॑तम् धे॒नूःऽइ॑व मन॑वे वि॒श्वऽदो॑हसः जना॑य वि॒श्वऽदो॑हसः

 

The Pada Paath - transliteration

tvam | vthā | nadya | indra | sartave | accha | samudram | asja | rathān-iva | vājayata | rathān-iva | ita | ūtī | ayuñjata | samānam | artham | akitam | dhenū-iva | manave | viśva-dohasa | janāya | viśva-dohas  


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१३०।०५

मन्त्रविषयः-

पुनः केऽत्र प्रकाशिता जायन्त इत्याह।

फिर इस संसार में कौन प्रकाशित होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(त्वम्) (वृथा) निष्प्रयोजनाय (नद्यः) (इन्द्र) विद्येश (सर्त्तवे) सर्त्तुं गन्तुम् (अच्छ) उत्तमरीत्या (समुद्रम्) सागरम् (असृजः) सृजेः (रथाँइव) यथा रथानधिष्ठाय (वाजयतः) सङ्ग्रामयतः (रथाँइव) (इतः) प्राप्ताः (ऊतीः) रक्षाद्याः क्रियाः (अयुञ्जत) युञ्जते (समानम्) तुल्यम् (अर्थम्) द्रव्यम् (अक्षितम्) क्षयरहितम् (धेनूरिव) यथा दुग्धदात्रीर्गाः (मनवे) मननशीलाय मनुष्याय (विश्वदोहसः) विश्वं सर्व जगद्गुणैर्दुहन्ति पिपुरति ते (जनाय) धर्म्ये प्रसिद्धाय (विश्वदोहसः) विश्वस्मिन् सुखप्रपूरकाः ॥५॥

हे (इन्द्र) विद्या के अधिपति ! (त्वम्) आप जैसे (नद्यः) नदी (समुद्रम्) समुद्र को (वृथा) निष्प्रयोजन भर देती वैसे (रथानिव) रथों पर बैठनेहारों के समान (वाजयतः) संग्राम करते हुओं को (रथानिव) रथों के समान ही (सर्त्तवे) जाने को (अच्छ, असृजः) उत्तम रीति से कलायन्त्रों से युक्त मार्गों को बनावें वा (जनाय) धर्मयुक्त व्यवहार में प्रसिद्ध मनुष्य के लिये जो (विश्वदोहसः) समस्त जगत् को अपने गुणों से परिपूर्ण करते उनके समान (मनवे) विचारशील पुरुष के लिये (विश्वदोहसः) संसार सुख को परिपूर्ण करनेवाले होते हुए आप (धेनूरिव) दूध देनेवाली गौओं के समान (इतः) प्राप्त हुई (ऊतीः) रक्षादि क्रियाओं और (अक्षितम्) अक्षय (समानम्) समान अर्थात् काम के तुल्य (अर्थम्) पदार्थ का (अयुञ्जत) योग करते हैं वे अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥५॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र त्वं यथा नद्यः समुद्रं वृथा सृजन्ति तथा रथानिव वाजयतो रथानिव सर्त्तवे अच्छासृजः। जनाय विश्वदोहसइव ये मनवे विश्वदोहसस्सन्तो भवन्तो धेनूरिवेत ऊती रक्षितं समानमर्थ चायुञ्जत तेऽत्यन्तमानन्दं प्राप्नुवन्ति ॥५॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्काराः। ये धेनुवत्सुखं रथवद्धर्म्यमार्गमवंलम्ब्य धार्मिकन्यायाधीशवद्भूत्वा सर्वान् स्वसदृशान् कुर्वन्ति तेऽत्र प्रशंसिता जायन्ते ॥५॥    

इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो पुरुष गौओं के समान सुख, रथ के समान धर्म के अनुकूल मार्ग का अवलम्ब कर धार्मिक न्यायाधीश के समान होकर सबको अपने समान करते हैं वे इस संसार में प्रंशसित होते हैं ॥५॥

 
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