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Mantra Rig 01.128.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 128 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 14 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 12 of Anuvaak 19 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- परुच्छेपो दैवोदासिः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृदत्यष्टिः

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒यं जा॑यत॒ मनु॑षो॒ धरी॑मणि॒ होता॒ यजि॑ष्ठ उ॒शिजा॒मनु॑ व्र॒तम॒ग्निः स्वमनु॑ व्र॒तम् वि॒श्वश्रु॑ष्टिः सखीय॒ते र॒यिरि॑व श्रवस्य॒ते अद॑ब्धो॒ होता॒ नि ष॑ददि॒ळस्प॒दे परि॑वीत इ॒ळस्प॒दे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अयं जायत मनुषो धरीमणि होता यजिष्ठ उशिजामनु व्रतमग्निः स्वमनु व्रतम् विश्वश्रुष्टिः सखीयते रयिरिव श्रवस्यते अदब्धो होता नि षददिळस्पदे परिवीत इळस्पदे

 

The Mantra's transliteration in English

aya jāyata manuo dharīmai hotā yajiṣṭha uśijām anu vratam agni svam anu vratam | viśvaśruṣṭi sakhīyate rayir iva śravasyate | adabdho hotā ni adad ias pade parivīta ias pade 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अयम् जा॒य॒त॒ मनु॑षः॑ धरी॑मणि होता॑ यजि॑ष्ठः उ॒शिजा॑म् अनु॑ व्र॒तम् अ॒ग्निः स्वम् अनु॑ व्र॒तम् वि॒श्वऽश्रु॑ष्टिः स॒खि॒ऽय॒ते र॒यिःऽइ॑व श्र॒व॒स्य॒ते अद॑ब्धः होता॑ नि स॒द॒त् इ॒ळः प॒दे परि॑ऽवीतः इ॒ळः प॒दे

 

The Pada Paath - transliteration

ayam | jāyata | manua | dharīmai | hotā | yajiṣṭha | uśijām | anu | vratam | agni | svam | anu | vratam | viśva-śruṣṭi | sakhi-yate | rayi-iva | śravasyate | adabdha | hotā | ni | sadat | ia | pade | pari-vīta | ia | pade


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१२८।०१

मन्त्रविषयः-

पुनर्विद्यार्थिनः कीदृशा भवेयुरित्याह।

फिर विद्यार्थी लोग कैसे होवें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(अयम्) (जायत) जायते (मनुषः) विद्वान् (धरीमणि) धरन्ति सुखानि यस्मिँस्तस्मिन्व्यवहारे (होता) आदाता (यजिष्ठः) अतिशयेन यष्टा संगन्ता (उशिजाम्) कामयमानानां जनानाम् (अनु) आनुकूल्ये (व्रतम्) शीलम् (अग्निः) पावक इव (स्वम्) स्वकीयम् (अनु) (व्रतम्) (विश्वश्रुष्टिः) विश्वाः श्रुष्टस्त्वरिता गतयो यस्य सः। अत्र श्रु धातोर्बाहुलकादौणादिकः क्तिन्प्रत्ययः। (सखीयते) सखेवाचरति (रयिरिव) श्रीरिव (श्रवस्यते) श्रोष्यमाणाय (अदब्धः) अहिंसितः (होता) दाता (नि) नितराम् (सदत्) सीदति (इळः) स्तोतुमर्हस्य जगदीश्वरस्य (पदे) प्राप्तव्ये विज्ञाने (परिवीतः) परितः सर्वतो वीतं प्राप्तं विज्ञानं येन सः (इळः) प्रशंसितस्य धर्मस्य (पदे) पदनीये ॥१॥

जो (अयम्) यह मनुष्य (इळः) स्तुति के योग्य जगदीश्वर के (पदे) प्राप्त होने योग्य विशेष ज्ञान में जैसे वैसे (इळः) प्रशंसित धर्म के (पदे) पाने योग्य व्यवहार में (अदब्धः) हिंसा आदि दोषरहित (होता) उत्तम गुणों का ग्रहण करनेहारा (परिवीतः) जिसने सब ओर से ज्ञान पाया ऐसा हुआ (नि, षदत्) स्थिर होता (रयिरिव) वा धन के समान (विश्वश्रुष्टिः) जिसकी समस्त शीघ्र चालें ऐसा हुआ (श्रवस्यते) सुननेवाले के लिये (अग्निः) आग के समान वा (उशिजाम्) कामना करनेवाले मनुष्यों के (अनु) अनुकूल (व्रतम्) स्वभाव के तुल्य (अनु, व्रतं, स्वम्) अनुकूल ही अपने आचरण को प्राप्त वा (धरीमणि) जिसमें सुखों का धारण करते उस व्यवहार में (होता) देनेहारा (यजिष्ठः) और अत्यन्त सङ्ग करता हुआ (जायत) प्रकट होता वह (मनुषः) मननशील विद्वान् सबके साथ (सखीयते) मित्र के समान आचरण करनेवाला और सबको सत्कार करने योग्य होवे ॥१॥

 

अन्वयः-

योऽयमिडस्पदइवेडस्पदेऽदब्धो होता परिवीतस्सन् निषदद्रयिरिव विश्वश्रुष्टिः सन् श्रवस्यतेऽग्निरिवोशिजामनुव्रतमिवाऽनुव्रतं स्वं प्राप्तो धरीमणि होता यजिष्ठः सन् जायत स मनुषो सर्वैः सह सखीयते पूज्यश्च स्यात् ॥१॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यो विद्यां कामयमानानामनुगामि सुशीलो धर्म्ये व्यवहारे सुनिष्ठः सर्वस्य सुहृत् शुभगुणदाता स्यात् स एव मनुष्यमुकुटमणिर्भवेत् ॥१॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या की इच्छा करनेवालों के अनुकूल चालचलन चलनेवाला सुशील धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छी निष्ठा रखनेवाला सबका मित्र शुभ गुणों का ग्रहण करनेवाला हो वही मनुष्यों का मुकुटमणि अर्थात् अति श्रेष्ठ शिरधरा होवे ॥१॥

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