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Mantra Rig 01.126.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 126 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 11 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 69 of Anuvaak 18 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- भावयव्यः

देवता (Devataa) :- विद्वाँसः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

आग॑धिता॒ परि॑गधिता॒ या क॑शी॒केव॒ जङ्ग॑हे ददा॑ति॒ मह्यं॒ यादु॑री॒ याशू॑नां भो॒ज्या॑ श॒ता

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

आगधिता परिगधिता या कशीकेव जङ्गहे ददाति मह्यं यादुरी याशूनां भोज्या शता

 

The Mantra's transliteration in English

āgadhitā parigadhitā yā kaśīkeva jagahe | dadāti mahya yādurī yāśūnām bhojyā śatā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

आऽग॑धिता परि॑ऽगधिता या क॒शी॒काऽइ॑व जङ्ग॑हे ददा॑ति मह्य॑म् यादु॑री याशू॑नाम् भो॒ज्या॑ श॒ता

 

The Pada Paath - transliteration

āgadhitā | pari-gadhitā | yā | kaśīkāiva | jagahe | dadāti | mahyam | yādurī | yāśūnām | bhojyā | śatā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१२६।०६

मन्त्रविषयः-

कैः काऽत्र राज्येऽवश्यं प्राप्तव्येत्याह।

किनसे इस राज्य में क्या अवश्य पानी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(आगधिता) समन्ताद्गृहीता। गध्यं गृह्णातेः। निरु० ५।१५। (परिगधिता) परितः सर्वतो गधिता शुभैर्गुणैर्युक्ता नीतिः। गध्यतिर्मिश्रीभावकर्मा। निरु० ५।१५। (या) (कशीकेव) यथा ताडनार्था कशीका (जङ्गहे) अत्यन्तं ग्रहीतव्ये (ददाति) (मह्यम्) (यादुरी) प्रत्यनशीला। अत्र यतधातोर्बाहुलकादौणादिक उरी प्रत्ययः तस्य दः। (याशूनाम्) प्रयतमानानाम्। अत्र यसु प्रयत्ने धातोर्बाहुलकादुण्प्रत्ययः सत्य शश्च। (भोज्या) भोक्तुं योग्यानि (शता) शतानि असंख्यातानि वस्तूनि ॥६॥

(या) जो (आगधिता) अच्छे प्रकार ग्रहण की हुई (परिगधिता) सब ओर से उत्तम-उत्तम गुणों से युक्त (जङ्गहे) अत्यन्त ग्रहण करने योग्य व्यवहार में (कशीकेव) पशुओं के ताड़ना देनेके लिये जो औगी होती उसके समान (याशूनाम्) अच्छा यत्न करनेवालों की (यादुरी) उत्तम यत्नवाली नीति (भोज्या) भोगने योग्य (शता) सैकड़ों वस्तु (मह्यम्) मुझे (ददाति) देती है वह सबको स्वीकार करने योग्य है ॥६॥

 

अन्वयः-

या आगधिता परिगधिता जङ्गहे कशीकेव याशूनां यादुरी शता भोज्या मह्यं ददाति सा सर्वैः स्वीकार्य्या ॥६॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यया नीत्याऽसंख्यातानि (सुखानि) स्युः सा सर्वैः संपादनीया ॥६॥   

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस नीति अर्थात् धर्म की चाल (से) अगणित सुख हों वह सबको सिद्ध करनी चाहिये ॥६॥

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