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Mantra Rig 01.124.012

MANTRA NUMBER:

Mantra 12 of Sukta 124 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 9 of Adhyaya 1 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 55 of Anuvaak 18 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः

देवता (Devataa) :- उषाः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उत्ते॒ वय॑श्चिद्वस॒तेर॑पप्त॒न्नर॑श्च॒ ये पि॑तु॒भाजो॒ व्यु॑ष्टौ अ॒मा स॒ते व॑हसि॒ भूरि॑ वा॒ममुषो॑ देवि दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय

 

The Mantra's transliteration in English

ut te vayaś cid vasater apaptan naraś ca ye pitubhājo vyuṣṭau | amā sate vahasi bhūri vāmam uo devi dāśue martyāya ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उत् ते॒ वयः॑ चि॒त् व॒स॒तेः अ॒प॒प्त॒न् नरः॑ च॒ ये पि॒तु॒ऽभाजः॑ विऽउ॑ष्टौ अ॒मा स॒ते व॒ह॒सि॒ भूरि॑ वा॒मम् उषः॑ दे॒वि॒ दा॒शुषे॑ मर्त्या॑य

 

The Pada Paath - transliteration

ut | te | vaya | cit | vasate | apaptan | nara | ca | ye | pitu-bhāja | vi-uṣṭau | amā | sate | vahasi | bhūri | vāmam | ua | devi | dāśue | martyāya ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१२।१२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(उत्) (ते) तुभ्यम् (वयः) (चित्) अपि (वसतेः) निवासात् (अपप्तन्) पतन्ति (नरः) मनुष्याः (च) (ये) (पितुभाजः) अन्नस्य विभाजकाः (व्युष्टौ) विशिष्टे निवासे (अमा) समीपस्थगृहाय (सते) वर्त्तमानाय (वहसि) (भूरि) बहु (वामम्) प्रशस्यम् (उषः) उषर्वद्विद्याप्रकाशयुक्ते (देवि) दात्रि (दाशुषे) दात्रे (मर्त्याय) नराय पतये ॥१२

हे (नरः) मनुष्यो ! (ये) जो (पितुभाजः) अन्न का विभाग करनेवाले तुम लोग (चित्) भी जैसे (वयः) अवस्था को (वसतेः) वसीति से (उत् अपप्तन्) उत्तमता के साथ प्राप्त होते वैसे ही (व्युष्टौ) विशेष निवास में (अमा) समीप के घर वा (सते) वर्त्तमान व्यवहार के लिये होओ और हे (उषः) प्रातःसमय के प्रकाश के समान विद्याप्रकाशयुक्त (देवि) उत्तम व्यवहार की देनेवाली स्त्री ! जो तूं (च) भी (दाशुषे) देनेवाले (मर्त्याय) अपने पति के लिये तथा समीप के घर और वर्त्तमान व्यवहार के लिये (भूरि) बहुत (वामम्) प्रशंसनीय व्यवहार की (वहसि) प्राप्ति करती उस (ते) तेरे लिये उक्त व्यवहार की प्राप्ति तेरा पति भी करे ॥१२

 

अन्वयः-

हे नरो ये पितुभाजो यूयं चिद् यथा वयो वसतेरुदपप्तन् तथा व्युष्टावमा सते भवत। हे उषर्वद्देवि स्त्रि या त्वं च दाशुषे मर्त्यायामासते भूरि वामं वहसि तस्यै ते तुभ्यमेतत्पतिरपि वहतु ॥१२

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा पक्षिण उपर्य्यधो गच्छन्ति तथोषा रात्रिदिनयोरुपर्य्यधो गच्छति, यथा स्त्री पत्युः प्रियाचरणं कुर्य्यात्तथैव पतिरपि करोतु ॥१२

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पखेरू ऊपर और नीचे जाते हैं वैसे प्रातःसमय की वेला रात्रि और दिन के ऊपर और नीचे जाती है तथा जैसे स्त्री पति के प्रियाचरण को करे वैसे ही पति भी स्त्री के प्यारे आचरण को करे ॥१२

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