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Mantra Rig 01.120.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 120 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 23 of Adhyaya 8 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 78 of Anuvaak 17 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- उशिक्पुत्रः कक्षीवान्

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- स्वराडार्ष्यनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यु॒वं ह्यास्तं॑ म॒हो रन्यु॒वं वा॒ यन्नि॒रत॑तंसतम् ता नो॑ वसू सुगो॒पा स्या॑तं पा॒तं नो॒ वृका॑दघा॒योः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

युवं ह्यास्तं महो रन्युवं वा यन्निरततंसतम् ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायोः

 

The Mantra's transliteration in English

yuva hy āstam maho ran yuva vā yan niratatasatam | tā no vasū sugopā syātam pāta no vkād aghāyo ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यु॒वम् हि आस्त॑म् म॒हः रन् यु॒वम् वा॒ यत् निः॒ऽअत॑तंसतम् ता नः॒ व॒सू॒ इति॑ सु॒ऽगो॒पा स्या॒त॒म् पा॒तम् नः॒ वृका॑त् अ॒घ॒ऽयोः

 

The Pada Paath - transliteration

yuvam | hi | āstam | maha | ran | yuvam | vā | yat | ni-atatasatam | tā | na | vasūiti | su-gopā | syātam | pātam | na | vkāt | agha-yoḥ ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१२०।०७

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।       

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(युवम्) युवाम् (हि) किल (आस्तम्) आसाथाम्। व्यत्ययेन परस्मैपदम्। (महः) महतः (रन्) ददमानौ। दन्वदस्य सिद्धिः। (युवम्) युवाम् (वा) पक्षान्तरे (यत्) (निरततंसतम्) नितरां विद्यादिभिर्भूषणैरलंकुरुतम् (ता) तौ (नः) अस्मान् (वसू) वासयितारौ (सुगोपा) सुष्ठुरक्षकौ (स्यातम्) (पातम्) पालयतम् (न) अस्माकम् (वृकात्) स्तेनात् (अघायोः) आत्मनोऽन्यायाचरणेनाघमिच्छतः ॥७॥

हे (वसू) निवास करानेहारे अध्यापक-उपदेशको ! (रन्) औरों को सुख देते हुए जो (युवम्) तुम (यत्) जिस पर (आस्तम्) बैठो (वा) अथवा (युवम्) तुम दोनों (नः) हम लोगों के (सुगोपा) भली-भांति रक्षा करनेहारे (स्यातम्) होओ, वे (महः) बड़ा (अघायोः) जोकि अपने को अन्याय करने से पाप चाहता (वृकात्) उस चोर डाकू से (नः) हम लोगों को (पातम्) पालो और (ता) वे (हि) ही आप दोनों (निरततंसतम्) विद्या आदि उत्तम भूषणों से परिपूर्ण शोभायमान करो ॥७॥

 

अन्वयः-

हे वसू अश्विनौ रन् यौ युवं यदास्तं वा युवं नोऽस्माकं सुगोपा स्यातं तौ महोऽघायोर्वृकान्नोऽस्मान्पातं ता हि युवां निरततंसतं च ॥७॥

 

 

भावार्थः-

यथा सभासेनेशौ चोरादिभयात्प्रजास्त्रायेतां तथैतौ सर्वैः पालनीयौ स्याताम्। सर्वे धर्मेष्वासीनाः सन्तोऽध्यापकोपदेशकशिक्षका अधर्मं विनाशयेयुः ॥७॥

जैसे सभा सेनाधीश चोर आदि के भय से प्रजाजनों की रक्षा करें वैसे ये भी सब प्रजाजनों के पालना करने योग्य होवें। सब अध्यापक उपदेशक तथा शिक्षक आदि मनुष्य धर्म में स्थिर हुए अधर्म का विनाश करें ॥७॥

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