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Mantra Rig 01.118.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 118 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 18 of Adhyaya 8 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 51 of Anuvaak 17 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कक्षीवान्

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वां॒ रथो॑ अश्विना श्ये॒नप॑त्वा सुमृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ् यो मर्त्य॑स्य॒ मन॑सो॒ जवी॑यान्त्रिवन्धु॒रो वृ॑षणा॒ वात॑रंहाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वां रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ् यो मर्त्यस्य मनसो जवीयान्त्रिवन्धुरो वृषणा वातरंहाः

 

The Mantra's transliteration in English

ā vā ratho aśvinā śyenapatvā sumṛḻīka svavām̐ yātv arvā | yo martyasya manaso javīyān trivandhuro vṛṣaā vātara ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वा॒म् रथः॑ अ॒श्वि॒ना॒ श्ये॒नऽप॑त्वा सु॒ऽमृ॒ळी॒कः स्वऽवा॑न् या॒तु॒ अ॒र्वाङ् यः मर्त्य॑स्य मन॑सः जवी॑यान् त्रि॒ऽव॒न्धु॒रः वृ॒ष॒णा॒ वात॑ऽरंहाः

 

The Pada Paath - transliteration

ā | vām | ratha | aśvinā | śyena-patvā | su-mṛḷīka | sva-vān | yātu | arvā | ya | martyasya | manasa | javīyān | tri-vandhura | vṛṣaā | vāta-raḥ ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–११८।०१

मन्त्रविषयः-

अस्यादौ विद्वत्स्त्रीपुरुषौ किं कुर्य्यातामित्युपदिश्यते।

अब ग्यारह ११ ऋचावाले एकसौ अठारहवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् स्त्री-पुरुष क्या करें, यह विषय कहा है।

 

पदार्थः-

(आ) (वाम्) युवयोः (रथः) (अश्विना) शिल्पविदौ दम्पती (श्येनपत्वा) श्येनइव पतति। अत्र पतधातोरन्येभ्योऽपि दृश्यन्त इति वनिप्। (सुमृडीकः) सुष्ठुसुखयिता (स्ववान्) प्रशस्ताः स्वे भृत्याः पदार्था वा विद्यन्ते यस्मिन् (यातु) गच्छतु (अर्वाङ्) अधः (यः) (मर्त्यस्य) (मनसः) (जवीयान्) (त्रिबन्धुरः) त्रयो बन्धुरा अधोमध्योर्ध्वं बन्धा यस्मिन् (वृषणा) बलिष्ठौ (वातरंहाः) वात इव रंहो गमनं यस्य ॥१॥

हे (वृषणा) बलवान् (अश्विना) शिल्प कामों के जाननेवाले स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) तुम दोनों को (यः) जो (त्रिबन्धुरः) त्रिबंधुर अर्थात् जिसमें नीचे, बीच में और ऊपर बंधन हों (श्येनपत्वा) वाज पखेरू के समान जानेवाला (वातरंहाः) जिसका पवन समान वेग (मर्त्यस्य) मनुष्य के (मनसः) मन से भी (जवीयान्) अत्यन्त धावने और (सुमृडीकः) उत्तम सुख देनेवाला (स्ववान्) जिसमें प्रशंसित भृत्य वा अपने पदार्थ विद्यमान हैं ऐसा (रथः) रथ है, वह (अर्वाङ्) नीचे (आ, यातु) आवे ॥१॥

 

अन्वयः-

हे वृषणाऽश्विना वां यस्त्रिबन्धुरः श्येनपत्वा वातरंहा मर्त्यस्य मनसो जवीयान् सुमृडीकः स्ववान् रथोऽस्ति सोऽर्वाङ्ङायातु ॥१॥

 

 

भावार्थः-

स्त्रीपुरुषौ यदेदृशे यानं निर्मायोपयुञ्जीयातां तदा किं तत्सुखं यत्साद्धुं न शक्नुयाताम् ॥१॥

स्त्री-पुरुष जब ऐसे यान को उत्पन्न कर उपयोग में लावें तब ऐसा कौन सुख है जिसको वे सिद्ध नहीं कर सकें ॥१॥

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