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Mantra Rig 01.115.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 115 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 7 of Adhyaya 8 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 103 of Anuvaak 16 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ योषा॑म॒भ्ये॑ति प॒श्चात् यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो योषामभ्येति पश्चात् यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्

 

The Mantra's transliteration in English

sūryo devīm uasa rocamānām maryo na yoām abhy eti paścāt | yatrā naro devayanto yugāni vitanvate prati bhadrāya bhadram ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सूर्यः॑ दे॒वीम् उ॒षसम् रोच॑मानाम् मर्यः॑ योषा॑म् अ॒भि ए॒ति॒ प॒श्चात् यत्र॑ नरः॑ दे॒व॒ऽयन्तः॑ यु॒गानि॑ वि॒ऽत॒न्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम्

 

The Pada Paath - transliteration

sūrya | devīm | uasam | rocamānām | marya | na | yoām | abhi | eti | paścāt | yatra | nara | deva-yanta | yugāni | vi-tanvate | prati | bhadrāya | bhadram ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–११५।०२

मन्त्रविषयः-

पुनरीश्वरकृत्यमाह।

फिर ईश्वर का कृत्य अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(सूर्य्यः) सविता (देवीम्) द्योतिकाम् (उषसम्) सन्धिवेलाम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) अभितः (एति) (पश्चात्) (यत्रा) यस्मिन्। अत्र दीर्घः। (नरः) नयनकर्त्तारो गणकाः (देवयन्तः) कामयमाना गणितविद्यां जानन्तो ज्ञापयन्तः (युगानि) वर्षाणि कृतत्रेताद्वापरकलिसंज्ञानि वा (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) कल्याणम् ॥२॥

हे मनुष्यो ! जिस ईश्वर ने उत्पन्न करके (कक्षा) नियम में स्थापन किया यह (सूर्य्यः) सूर्य्यमण्डल (रोचमानाम्) रुचि कराने (देवीम्) और सब पदार्थों को प्रकाशित करनेहारी (उषसम्) प्रातःकाल की वेला को उसके होने के (पश्चात्) पीछे जैसे (मर्य्यः) पति (योषाम्) अपनी स्त्री को प्राप्त हो (न) वैसे (अभ्येति) सब ओर से दौड़ा जाता है, (यत्र) जिस विद्यमान सूर्य्य में (देवयन्तः) मनोहर चाल-चलन से सुन्दर गणितविद्या को जानते-जनाते हुए (नरः) ज्योतिष विद्या के भावों को दूसरों की समझ में पहुँचानेहारे ज्योतिषी जन (युगानि) पांच-पाचं संवत्सरों की गणना से ज्योतिष में युग वा सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग को जान (भद्राय) उत्तम सुख के लिये (भद्रम्) उस उत्तम सुख के (प्रति, वितन्वते) प्रति विस्तार करते हैं, उसी परमेश्वर को सबका उत्पन्न करनेहारा तुम लोग जानो ॥२॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या येनेश्वरेणोत्पाद्य स्थापितोऽयं सूर्यो रोचमानां देवीमुषसं पश्चान् मर्यो योषां नेवाभ्येति यत्र यस्मिन् विद्यमाने मार्त्तण्डे देवयन्तो नरो युगानि विज्ञाय भद्राय भद्रं प्रति वितन्वते। तमेव सकलस्रष्टारं यूयं विजानीत ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। हे विद्वांसो युष्माभिर्येनेश्वरेण सूर्य्यं निर्माय प्रतिब्रह्माण्डस्य मध्ये स्थापितस्तमाश्रित्य गणितादयः सर्वे व्यवहाराः सिध्यन्ति स कुतो न सेव्येत ॥२॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! तुम लोगों से जिस ईश्वर ने सूर्य्य को बनाकर प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थापन किया, उसके आश्रय से गणित आदि समस्त व्यवहार सिद्ध होते हैं, वह ईश्वर क्यों न सेवन किया जाय ॥२॥

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