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Mantra Rig 01.111.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 111 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 32 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 42 of Anuvaak 16 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- ऋभवः

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नो॑ य॒ज्ञाय॑ तक्षत ऋभु॒मद्वय॒: क्रत्वे॒ दक्षा॑य सुप्र॒जाव॑ती॒मिष॑म् यथा॒ क्षया॑म॒ सर्व॑वीरया वि॒शा तन्न॒: शर्धा॑य धासथा॒ स्वि॑न्द्रि॒यम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नो यज्ञाय तक्षत ऋभुमद्वयः क्रत्वे दक्षाय सुप्रजावतीमिषम् यथा क्षयाम सर्ववीरया विशा तन्नः शर्धाय धासथा स्विन्द्रियम्

 

The Mantra's transliteration in English

ā no yajñāya takata bhumad vaya kratve dakāya suprajāvatīm iam | yathā kayāma sarvavīrayā viśā tan na śardhāya dhāsathā sv indriyam ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नः॒ य॒ज्ञाय॑ त॒क्ष॒त॒ ऋ॒भु॒ऽमत् वयः॑ ऋत्वे॑ दक्षा॑य सु॒ऽप्र॒जाव॑तीम् इष॑म् यथा॑ क्षया॑म सर्व॑ऽवीरया वि॒शा तत् नः॒ शर्धा॑य धा॒स॒थ॒ सु इ॒न्द्रि॒यम्

 

The Pada Paath - transliteration

ā | na | yajñāya | takata | bhu-mat | vaya | tve | dakāya | su-prajāvatīm | iam | yathā | kayāma | sarva-vīrayā | viśā | tat | na | śardhāya | dhāsatha | su | indriyam ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।१११।०२

मन्त्रविषयः

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ।

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

 

पदार्थः

(आ) समन्तात् (नः) अस्माकम् (यज्ञाय) संगतिकरणाख्यशिल्पक्रियासिद्धये (तक्षत) निष्पादयत (ऋभुमत्) प्रशस्ता ऋभवो मेधाविनो विद्यन्ते यस्मिँस्तत् (वयः) आयुः (क्रत्वे) प्रज्ञायै न्यायकर्मणे वा (दक्षाय) बलाय (सुप्रजावतीम्) सुष्ठु प्रजा विद्यन्ते यस्यां ताम् (इषम्) इष्टमन्नम् (यथा) (क्षयाम) निवासं करवाम (सर्ववीरया) सर्वैर्वीरैर्युक्तया (विशा) प्रजया (तत्) (नः) अस्माकम् (शर्द्धाय) बलाय (धासथ) धरत । अत्रान्येषामपीति दीर्घः । (सु) (इन्द्रियम्) विज्ञानं धनं वा ॥२॥

हे बुद्धिमानो ! तुम (नः) हमारी (यज्ञाय) जिससे एक दूसरे से पदार्थ मिलाया जाता है उस शिल्पक्रिया की सिद्धि के लिये वा (क्रत्वे) उत्तम ज्ञान और न्याय के काम और (दक्षाय) बल के लिये (ऋभुमत्) जिसमें प्रशंसित मेधावी अर्थात् बुद्धिमान् जन विद्यमान हैं उस (वयः) जीवन को तथा (सुप्रजावतीम्) जिसमें अच्छी प्रजा विद्यमान हो अर्थात् प्रजाजन प्रसन्न होते हों (इषम्) उस चाहे हुए अन्न को (आतक्षत) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो, (यथा) जैसे हम लोग (सर्ववीरया) समस्त वीरों से युक्त (विशा) प्रजा के साथ (क्षयाम) निवास करें तुम भी प्रजा के साथ निवास करो वा जैसे हम लोग (शर्द्धाय) बल के लिये (तत्) उस (सु, इन्द्रियम्) उत्तम विज्ञान और धन को धारण करें वैसे तुम भी (नः) हमारे बल होने के लिये उत्तम ज्ञान और धन को (धासथ) धारण करो ॥२॥

 

अन्वयः

हे ऋभवो यूयं नोऽस्माकं यज्ञाय क्रत्वे दक्षाय ऋभुमद्वयः सुप्रजावतीमिषं चातक्षत यथा वयं सर्ववीरया विशा क्षयाम तथा यूयमपि प्रजया सह निवसत यथा वयं शर्द्धाय स्विन्द्रियं दध्याम तथा यूयमपि नोऽस्माकं शर्द्धाय तत् स्विन्द्रियं धासथ ॥२॥

 

 

भावार्थः

अत्रोपमालङ्कारः । इह जगति विद्वद्भिः सहाविद्वांसोऽविद्वद्भिः सह विद्वांसश्च प्रीत्या नित्यं वर्तेरन् । नैतेन कर्मणा विना शिल्पविद्यासिद्धिः प्रजाबलं शोभनाः प्रजाश्च जायन्ते ॥२॥

इस संसार में विद्वानों के साथ अविद्वान् और अविद्वानों के साथ विद्वान् जन प्रीति से नित्य अपना वर्त्ताव रक्खें । इस काम के विना शिल्पविद्यासिद्धि, उत्तम बुद्धि, बल और श्रेष्ठ प्रजाजन कभी नहीं हो सकते ॥२॥







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