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Mantra Rig 01.108.013

MANTRA NUMBER:

Mantra 13 of Sukta 108 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 8 of Varga 27 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 23 of Anuvaak 16 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्राग्नी

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ए॒वेन्द्रा॑ग्नी पपि॒वांसा॑ सु॒तस्य॒ विश्वा॒स्मभ्यं॒ सं ज॑यतं॒ धना॑नि तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

एवेन्द्राग्नी पपिवांसा सुतस्य विश्वास्मभ्यं सं जयतं धनानि तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः

 

The Mantra's transliteration in English

evendrāgnī papivāsā sutasya viśvāsmabhya sa jayata dhanāni | tan no mitro varuo māmahantām aditi sindhu pthivī uta dyau ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ए॒व इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ प॒पि॒ऽवांसा॑ सु॒तस्य॑ विश्वा॑ अ॒स्मभ्य॑म् सम् ज॒यत॒म् धना॑नि तत् नः॒ मि॒त्रः वरु॑णः म॒म॒ह॒न्ता॒म् अदि॑तिः सिन्धुः॑ पृ॒थि॒वी उ॒त द्यौः

 

The Pada Paath - transliteration

eva | indrāgnī iti | papi-vāsā | sutasya | viśvā | asmabhyam | sam | jayatam | dhanāni | tat | na | mi tra | varua | mamahantām | aditi | sindhu | pthivī | uta | dyauḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०८।१३

मन्त्रविषयः-

पुनर्धनपतिसेनाध्यक्षौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

अब धनपति और सेनापति कैसे हैं, यह अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(एव) अवधारणे (इन्द्राग्नी) परमधनाढ्यो युद्धविद्याप्रवीणश्च (पपिवांसा) पीतवन्तौ (सुतस्य) निष्पन्नस्य (विश्वा) अखिलानि (अस्मभ्यम्) (सम्) (जयतम्) (धनानि) (तन्नो, मित्रो०) इति पूर्ववत् ॥१३॥

(मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ गुणयुक्त (अदितिः) उत्तम विद्वान् (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्य का प्रकाश जिनको (नः) हम लोगों के लिये (मामहन्ताम्) बढ़ावें (तत्, एव) उन्हीं (विश्वा) समस्त (धनानि) धनों को (सुतस्य) पदार्थों के निकाले हुए रस को (पपिवांसा) पिये हुए (इन्द्राग्नी) अति धनी वा युद्धविद्या में कुशल वीरजन (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (संजयतम्) अच्छी प्रकार जीतें अर्थात् सिद्ध करें ॥१३॥

 

अन्वयः-

मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्यानि नोऽस्मभ्यं मामहन्तां तत् तान्येव विश्वा धनानि सुतस्य निष्पन्नस्य रसं पपिवांसा इन्द्राग्नी संजयतं सम्यक् साधयतः ॥१३॥

 

 

भावार्थः-

नहि विद्वद्भ्यां बलिष्ठाभ्यां धार्मिकाभ्यां कोशसेनाध्यक्षाभ्यां विनोत्तमपुरुषार्थिनां विद्यादिधनानि वर्धितुं शक्यानि तथा मित्रादयः स्वमित्रभ्यः सुखानि प्रयच्छन्ति तथैव कोशसेनाध्यक्षादयः प्रजास्थेभ्यः प्राणिभ्यः सुखानि ददति तस्मात्सर्वैरेतौ सदा संपालनीयौ ॥१३॥

अत्र पवनविद्युदादिगुणवर्णनादेतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति वेद्यम् ॥

इत्यष्टोत्तरशततमं सूक्तं सप्तविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥   

विद्वान्, बलिष्ठ, धार्मिक, कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष और उत्तम पुरुषार्थ करनेवालों के विना विद्या आदि धन नहीं बढ़ सकेत हैं। जैसे मित्र आदि अपने मित्रों के लिये सुख देते हैं वैसे ही कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष आदि प्रजाजनों के लिये सुख देते हैं, इससे सबको चाहिये कि इनकी सदा पालना करें ॥१३॥

इस सूक्त में पवन और बिजुली आदि गुणों के वर्णन से उसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥

यह १०८ एकसौ आठवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥

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