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Mantra Rig 01.108.008

 

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 108 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 27 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 16 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्राग्नी

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यदि॑न्द्राग्नी॒ यदु॑षु तु॒र्वशे॑षु॒ यद्द्रु॒ह्युष्वनु॑षु पू॒रुषु॒ स्थः अत॒: परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यदिन्द्राग्नी यदुषु तुर्वशेषु यद्द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु स्थः अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य

 

The Mantra's transliteration in English

yad indrāgnī yaduu turvaśeu yad druhyuv anuu pūruu stha | ata pari vṛṣaāv ā hi yātam athā somasya pibata sutasya ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत् इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ यदु॑षु तु॒र्वशे॑षु यत् द्रु॒ह्युषु॑ अनु॑षु पू॒रुषु॑ स्थः अतः॑ परि॑ वृ॒ष॒णौ॒ हि या॒तम् अथ॑ सोम॑स्य पि॒ब॒त॒म् सु॒तस्य॑

 

The Pada Paath - transliteration

yat | indrāgnī iti | yaduu | turvaśeu | yat | druhyuu | anuu | pūruu | stha | ata | pari | vṛṣaau | ā | h i | yātam | atha | somasya | pibatam | sutasya ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०८।०८

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यत्) यतः (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (यदुषु) प्रयत्नकारिषु मनुष्येषु (तुर्वशेषु) तूर्वन्तीति तुरस्तेषां वशा वशं कर्त्तारो मनुष्यास्तेषु (यत्) यतः (द्रुह्युषु) द्रोहकारिषु (अनुषु) प्राणप्रदेषु (पूरुषु) परिपूर्णसद्गुणविद्याकर्मसु मनुष्येषु। यदव इत्यादि पञ्चविंशतिर्मनुष्य ना–०। निघं० २।३। (स्थः) (अतः) (परि०) इति पूर्ववत् ॥८॥

हे (इन्द्राग्नी) स्वामि शिल्पिजनो ! तुम दोनों (यत्) जिस कारण (यदुषु) उत्तम यत्न करनेवाले मनुष्यों में वा (तुर्वषु) जो हिंसक मनुष्यों को वश में करें उनमें वा (यत्) जिस कारण (द्रुह्युषु) द्रोही जनों में वा (अनुषु) प्राण अर्थात् जीवन सुख देनेवालों में तथा (पूरुषु) जो अच्छे गुण, विद्या वा कामों में परिपूर्ण हैं उनमें यथोचित अर्थात् जिससे जैसा चाहिये वैसा वर्तनेवाले (स्थः) हो (अतः) इस कारण से सब मनुष्यों में (वृषणौ) सुखरूपी वर्षा करते हुए (आ, यातम्) अच्छे प्रकार आओ (हि) एक निश्चय के साथ, (अथ) इसके अनन्तर (सुतस्य) निकासे हुए (सोमस्य) जगत् के पदार्थों के रस को  (परि, पिबतम्) अच्छी प्रकार पिओ ॥८॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्राग्नी युवां यद् यदुषु तुर्वशेषु यद्द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु यथोचित व्यवहारवर्त्तिनौ स्थोऽतः कारणात्सर्वेषु वृषणौ सन्तावायातं हि खल्वथ सुतस्य सोमस्य रसं परि पिबतम् ॥८॥

 

 

भावार्थः-

यौ न्यायसेनाधिकृतौ मनुष्येषु यथायोग्यं वर्त्तेते तावेव तत्कर्मसु सर्वैर्मनुष्यैः स्थापयित्वा कार्यसिद्धिः संपादनीया ॥८॥   

जो न्याय और सेना के अधिकार को प्राप्त हुए मनुष्यों में यथायोग्य वर्त्तमान हैं सब मनुष्यों को चाहिये कि उनको ही उन कामों में स्थापन अर्थात् मानकर कामों की सिद्धि करें ॥८॥

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