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Mantra Rig 01.105.017

MANTRA NUMBER:

Mantra 17 of Sukta 105 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 23 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 123 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रि॒तः कूपेऽव॑हितो दे॒वान्ह॑वत ऊ॒तये॑ तच्छु॑श्राव॒ बृह॒स्पति॑: कृ॒ण्वन्नं॑हूर॒णादु॒रु वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रितः कूपेऽवहितो देवान्हवत ऊतये तच्छुश्राव बृहस्पतिः कृण्वन्नंहूरणादुरु वित्तं मे अस्य रोदसी

 

The Mantra's transliteration in English

trita kūpe 'vahito devān havata ūtaye | tac chuśrāva bhaspati kṛṇvann ahūraād uru vittam me asya rodasī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रि॒तः कूपे॑ अव॑ऽहितः दे॒वान् ह॒व॒ते॒ ऊ॒तये॑ तत् शु॒श्रा॒व॒ बृह॒स्पतिः॑ कृ॒ण्वन् अं॒हू॒र॒णात् उ॒रु वि॒त्तम् मे॒ अ॒स्य रो॒द॒सी॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

trita | kūpe | ava-hita | devān | havate | ūtaye | tat | śuśrāva | bhaspati | kṛṇvan | ahūraāt | uru | vittam | me | asya | rodasī iti ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०५।१७

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(त्रितः) यस्त्रीन् विषयान् विद्याशिक्षाब्रह्मचर्याणि तनोति सः। अत्र त्र्यु पपदात्तनोतेरौणादिको डः प्रत्ययः। (कूपे) कूपाकारे हृदये (अवहितः) अवस्थितः (देवान्) दिव्यगुणान्वितान् विदुषो दिव्यान् गुणान् वा (हवते) गृह्णाति। अत्र बहुलं छन्दसीति शपः स्थाने श्ळोरभावः। (ऊतये) रक्षणाद्याय (तत्) विद्याध्यापनम् (शुश्राव) श्रुतवान् (बृहस्पतिः) बृहत्या वाचः पालकः (कृण्वन्) कुर्वन् (अंहूरणात्) अंहूरं पापं विद्यतेऽस्मिन् व्यवहारे ततः (उरु) बहु (वित्तं, मे, अस्य०) इति पूर्ववत् ॥१७॥

जो (उरु) बहुत (तत्) उस विद्या के पाठ को (शुश्राव) सुनता है वह विज्ञान को (कृण्वन्) प्रकट करता हुआ (त्रितः) विद्या, शिक्षा और ब्रह्मचर्य्य इन तीन विषयों का विस्तार करने अर्थात् इनको बढ़ाने (कूपे) कूआ के आकर अपने हृदय में (अवहितः) स्थिरता रखने और (बृहस्पतिः) बड़ी वेदवाणी का पालनेहारा (अंहूरणान्) जिस व्यवहार में अधर्म है उससे अलग होकर (ऊतये) रक्षा, आनन्द, कान्ति, प्रेम, तृप्ति आदि अनेकों सुखों के लिये (देवान्) दिव्य गुणयुक्त विद्वानों वा दिव्य गुणों को (हवते) ग्रहण करता है। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम के तुल्य जानना चाहिये ॥१७॥

 

अन्वयः-

य उरु तच्छ्वणं शुश्राव स विज्ञानं कृण्वन् त्रितः कूपेऽवहितो बृहस्पतिरंहूरणात्पृथग्भूत्वोतये देवान् हवते। अन्यत् पूर्ववत् ॥१७॥

 

 

भावार्थः-

यो मनुष्यो देहधारी जीवास्स्वबुद्ध्या प्रयत्नेन विदुषां सकाशात्सर्वा विद्याः श्रुत्वा मत्वा निदिध्यास्य साक्षात्कृत्वा दुष्टगुणस्वभावपापानि त्यक्त्वा विद्वान् जायते स आत्मशरीररक्षणादिकं प्राप्य बहुसुखं प्राप्नोति ॥१७॥

जो मनुष्य वा देहधारी जीव अर्थात् स्त्री आदि भी अपनी बुद्धि से प्रयत्न के साथ पण्डितों की उत्तेजना से समस्त विद्याओं को सुन, मान, विचार और प्रकट कर खोटे गुण स्वभाव वा खोटे कार्मो को छोड़कर विद्वान् होता है वह आत्मा और शरीर की रक्षा आदि को पाकर बहुत सुख पाता है ॥१७॥

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