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Mantra Rig 01.105.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 105 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 22 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 120 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- पङ्क्तिः

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स॒त्तो होता॑ मनु॒ष्वदा दे॒वाँ अच्छा॑ वि॒दुष्ट॑रः अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सत्तो होता मनुष्वदा देवाँ अच्छा विदुष्टरः अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरो वित्तं मे अस्य रोदसी

 

The Mantra's transliteration in English

satto hotā manuvad ā devām̐ acchā viduṣṭara | agnir havyā suūdati devo deveu medhiro vittam me asya rodasī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स॒त्तः होता॑ म॒नु॒ष्वत् दे॒वान् अच्छ॑ वि॒दुःऽत॑रः अ॒ग्निः ह॒व्या सु॒सू॒द॒ति॒ दे॒वः दे॒वेषु॑ मेधि॑रः वि॒त्तम् मे॒ अ॒स्य रो॒द॒सी॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

satta | hotā | manuvat | ā | devān | accha | vidu-tara | agni | havyā | susūdati | deva | deveu | medhira | vittam | me | asya | rodasī iti ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०५।१४

मन्त्रविषयः-

पुनः स तत्र किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

फिर वह विद्वान् वहां क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(सत्तः) विज्ञानवान् दुःखहन्ता (होता) ग्रहीता (मनुष्वत्) यथोत्तमा मनुष्या श्रेष्ठानि कर्माण्यनुष्ठाय पापानि त्यक्त्वा सुखिनो भवन्ति तथा (आ) (देवान्) विदुषो दिव्यक्रियायोगान् वा (अच्छ) सम्यग्रीत्या। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (विदुष्टरः) अतिशयेन वेत्ता (अग्निः) सद्विद्याया वेत्ता विज्ञापयिता वा (हव्या) दातुं ग्रहीतुं योग्यानि (सुषूदति) ददाति (देवः) प्रशस्तो विद्वान्मनुष्यः (देवेषु) विद्वत्सु (मेधिरः) मेधावी। अत्र मेधारथाभ्यामीरन्नीरचौ*। अ० ५।२।१०९। इति वार्त्तिकेन मत्वर्थीय ईरन् प्रत्ययः। (वित्तं, मे०) इति पूर्ववत् ॥१४॥ 

*‘मेधारथाभ्यामीरन्नीरचौ’। अ० ५।२।१०९। इति वार्त्तिकेन मत्वर्थीय ईरन् प्रत्ययः। सं०

हे मनुष्यो ! जो (सत्तः) विज्ञानवान् दुःख हरनेवाला (देवान्) विद्वान् वा दिव्य-दिव्य क्रियायोगों का (होता) ग्रहरण करनेवाला (विदुष्टरः) अत्यन्त ज्ञानी (अग्निः) श्रेष्ठ विद्या का जानने वा समझानेवाला (मेधिरः) बुद्धिमान् (देवेषु) विद्वानों में (देवः) प्रशंसनीय विद्वान् मनुष्य (मनुष्वत्) जैसे उत्तम मनुष्य श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान कर पापों को छोड़ सुखी होते हैं वैसे (हव्या) देने-लेने योग्य पदार्थों को (अच्छ, आ, सुषूदति) अच्छी रीति से अत्यन्त देता है, उस उत्तम विद्वान् से विद्या और शिक्षा को ग्रहण करनी चाहिये ॥१४॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यः सत्तो देवान् होता विदुष्टरोऽग्निर्मेधिरो देवेषु देवो मनुष्वद्धव्याच्छ सुषूदति तस्मात्सर्वैर्विद्याशिक्षे ग्राह्ये। अन्यत्पूर्ववत् ॥१४॥

 

 

भावार्थः-

ईदृशो भाग्यहीनः को मनुष्य स्याद्यो विदुषां सकाशाद् विद्याशिक्षे अगृहीत्वैषां विरोधी भवेत् ॥१४॥  

ऐसा भाग्यहीन कौन जन होवे जो विद्वानों के तीर से विद्या और शिक्षा न लेके और इनका विरोधी हो ॥१४॥

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