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Mantra Rig 01.105.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 105 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 21 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 116 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- स्वराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒मी ये पञ्चो॒क्षणो॒ मध्ये॑ त॒स्थुर्म॒हो दि॒वः दे॒व॒त्रा नु प्र॒वाच्यं॑ सध्रीची॒ना नि वा॑वृतुर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अमी ये पञ्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिवः देवत्रा नु प्रवाच्यं सध्रीचीना नि वावृतुर्वित्तं मे अस्य रोदसी

 

The Mantra's transliteration in English

amī ye pañcokao madhye tasthur maho diva | devatrā nu pravācya sadhrīcīnā ni vāvtur vittam me asya rodasī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒मी इति॑ ये पञ्च॑ उ॒क्षणः॑ मध्ये॑ त॒स्थुः म॒हः दि॒वः दे॒व॒ऽत्रा नु प्र॒ऽवाच्य॑म् स॒ध्री॒ची॒नाः नि व॒वृ॒तुः॒ वि॒त्तम् मे॒ अ॒स्य रो॒द॒सी॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

amī iti | ye | pañca | ukaa | madhye | tasthu | maha | diva | deva-trā | nu | pra-vācyam | sadhrīcīnā | ni | vavtu | vittam | me | asya | rodasī iti ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०५।१०

मन्त्रविषयः-

पुनरेते परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते।

फिर ये परस्पर कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(अमी) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाः (ये) (पञ्च) यथाग्निवायुमेघविद्युत्सूर्य्यमण्डलप्रकाशास्तथा (उक्षणः) जलस्य सुखस्य वा सेक्तारो महान्तः। उक्षा इति महन्नाम०। निघं० ३।३। (मध्ये) (तस्थुः) तिष्ठन्ति (महः) महतः (दिवः) दिव्यगुणपदार्थ युक्तस्याकाशस्य (देवत्रा) देवेषु विद्वत्षु वर्त्तमानाः (नु) शीघ्रम् (प्रवाच्यम्) अध्यापनोपदेशार्थं विद्याऽऽज्ञापकं वचः (सध्रीचीनाः) सहवर्त्तमानाः (नि) (वावृतुः) वर्त्तन्ते। अत्र वर्त्तमाने लिट्। व्यत्ययेन परस्मैपदम्। तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्येति दीर्घत्वम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥१०॥

हे सभाध्यक्ष आदि सज्जनो ! तुमको जैसे (अमी) प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (उक्षणः) जल सींचने वा सुख सींचनेहारे बड़े (पञ्च) अग्नि, पवन, बिजुली, मेघ और सूर्य्यमण्डल का प्रकाश (महः) अपार (दिवः) दिव्यगुण और पदार्थयुक्त आकाश के (मध्ये) बीच (तस्थुः) स्थिर है और जैसे (सध्रीचीनाः) एक साथ रहनेवाले गुण (देवत्रा) विद्वानों में (नि, वावृतुः) निरन्तर वर्त्तमान है वैसे (ये) जो निरन्तर वर्त्तमान हैं उन प्रजा तथा राजाओं के संगियों के प्रति विद्या और न्याय प्रकाश की बात (नु) शीघ्र (प्रवाच्यम्) कहनी चाहिये। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥१०॥

 

अन्वयः-

हे सभाध्यक्षादयो जना युष्माभिर्यथाऽमी उक्षणः पञ्च महो दिवो मध्ये तस्थुर्यथा च सध्रीचीना देवत्रा निवावृतुस्तथा ये नितरां वर्त्तन्ते तान् प्रजाराजप्रसङ्गिनः प्रति विद्यान्यायप्रकाशवचो नु प्रवाच्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥१०॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यादयो घटपटादिपदार्थेषु संभुज्य वृष्ट्यादिद्वारा महत्सुखं संपादयन्ति सर्वेषु पृथिव्यादिपदार्थेष्वाकर्षणादिना सहिता वर्त्तन्ते च। तथैव सभाद्यध्यक्षादयो महद्गुणविशिष्टान् मनुष्यान् संपाद्यैतैः सह न्यायप्रीतिभ्यां सह वर्त्तित्वा सुखिनः सततं कुर्युः ॥१०॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि घटपटादि पदार्थों में संयुक्त होकर वृष्टि आदि के द्वारा अत्यन्त सुख को उत्पन्न करते हैं और समस्त पृथिवी आदि पदार्थों में आकर्षणशक्ति से वर्त्तमान है वैसे ही सभाध्यक्ष आदि महात्मा जनो के गुणों वा बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त मनुष्यों को सिद्ध करके इनसे न्याय और प्रीति के साथ वर्त्तकर निरन्तर सुखी करें ॥१०॥

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