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Mantra Rig 01.105.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 105 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 21 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 112 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम् कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

कद्व ऋतस्य धर्णसि कद्वरुणस्य चक्षणम् कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी

 

The Mantra's transliteration in English

kad va tasya dharasi kad varuasya cakaam | kad aryamo mahas pathāti krāmema dūhyo vittam me asya rodasī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

कत् वः॒ ऋ॒तस्य॑ ध॒र्ण॒सि कत् वरु॑णस्य चक्ष॑णम् कत् अ॒र्य॒म्णः म॒हः प॒था अति॑ क्रा॒मे॒म॒ दुः॒ऽढ्यः॑ वि॒त्तम् मे॒ अ॒स्य रो॒द॒सी॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

kat | va | tasya | dharasi | kat | varuasya | cakaam | kat | aryama | maha | pathā | ati | krāmema | du-hya | vittam | me | asya | rodasī iti ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०५।०६

मन्त्रविषयः-

पुनरेतैः परस्परं किं किं प्रष्टव्य समाधातव्यं चेत्युपदिश्यते।

फिर इनको परस्पर क्या-क्या पूछना और समाधान करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(कत्) क्व (वः) एतेषाम् (ऋतस्य) कारणस्य (धर्णसि) धर्त्ता। अत्र सुपां सुलुगिति विभक्तेर्लुक्। (कत्) (वरुणस्य) जलादिकार्यस्य (चक्षणम्) दर्शनम् (कत्) केन (अर्यम्णः) सूर्यस्य (महः) महतः (पथा) मार्गेण (अति) (क्रामेम) ऊल्लङ्घयेम (दूढ्यः) दुःखेन ध्यातुं योग्यो व्यवहारः (वित्तं, मे अस्य, रोदसी) इति पूर्ववत् ॥६॥

हे विद्वानो ! (वः) इन स्थूल पदार्थों के (ऋतस्य) सत्य कारण का (धर्णसि) धारण करनेवाला (कत्) कहां है (वरुणस्य) जल आदि कार्यरूप पदार्थों का (चक्षणम्) देखना (कत्) कहां है तथा (महः) महान् (अर्यम्णः) सूर्य्यलोक का जो (दूढ्यः) अति गम्भीर दुःख से ध्यान में आने योग्य व्यवहार है उसको (कत्) किस (पथा) मार्ग से हम (अति, क्रामेम) पार हों अर्थात् उस विद्या से परिपूर्ण हों। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥६॥

 

अन्वयः-

हे विद्वांसो व एतेषां स्थूलानां पदार्थानामृतस्य सत्य कारणस्य धर्णसि कत् क्वास्ति वरुणस्य चक्षणं कदस्ति महोऽर्यम्णे यो दूढ्यो व्यवहारस्तं कत् केन पथाऽतिक्रामेम तस्य पारं गच्छाम तद्विद्यया परिपूर्णा भवेमेति यावत्। अन्यत् पूर्ववत् ॥६॥

 

 

भावार्थः-

विद्यां चिकीर्षुभिर्विदुषां सविधं प्राप्य कार्यकारणविद्यामार्गप्रश्नान् कृत्वोत्तराणि लब्ध्वा क्रियाकौशलेन कार्याणि संसाध्य दुःखं निहत्य सुखानि लब्धव्यानि ॥६॥

विद्या प्राप्ति की इच्छावाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वांनो के समीप जाकर कार्य्य और कारण की विद्या के मार्ग विषयक प्रश्नों को कर उनसे उत्तर पाकर क्रियाकुशलता से कामों को सिद्ध करके दुःख का नाश कर सुख पावें ॥६॥

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