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Mantra Rig 01.105.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 105 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 20 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 109 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मो षु दे॑वा अ॒दः स्व१॒॑रव॑ पादि दि॒वस्परि॑ मा सो॒म्यस्य॑ श॒म्भुव॒: शूने॑ भूम॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मो षु देवा अदः स्वरव पादि दिवस्परि मा सोम्यस्य शम्भुवः शूने भूम कदा चन वित्तं मे अस्य रोदसी

 

The Mantra's transliteration in English

mo u devā ada svar ava pādi divas pari | mā somyasya śambhuva śūne bhūma kadā cana vittam me asya rodasī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मो इति॑ सु दे॒वाः॒ अ॒दः स्वः॑ अव॑ पा॒दि॒ दि॒वः परि॑ मा सो॒म्यस्य॑ श॒म्ऽभुवः॑ शूने॑ भू॒म॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तम् मे॒ अ॒स्य रो॒द॒सी॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

mo iti | su | devā | ada | sva | ava | pādi | diva | pari | mā | somyasya | śam-bhuva | śūne | bhūma | kadā | cana | vittam | me | asya | rodasī iti ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०५।०३

मन्त्रविषयः-

अत्र जगति विद्वांसः कथः प्रष्टव्या इत्युपदिश्यते।

इस जगत् में विद्वान् जन कैसे पूछने के योग्य है, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(मो) निषेधे (सु) शोभने। अत्र सुषामादित्वात् षत्वम्। (देवाः) विद्वांसः (अदः) प्राप्स्यमानम् (स्वः) सुखम् (अव) विरुद्धे (पादि) प्रतिपद्यतां प्राप्यताम् (दिवः) सूर्यप्रकाशात् (परि) उपरिभावे। अत्र पञ्चम्याः परावध्यर्थे। अ० ८।३।५१। इति विसर्जनीयस्य सः। (मा) निषेधे (सोम्यस्य) सोममैश्वर्यमर्हस्य (शंभुवः) सुखं भवति यस्मात्तस्य। अत्र कृतो बहुलमित्यपादाने क्विप्। (शूने) वर्धने। अत्र नपुंसके भावे क्तः। (भूम) भवेम (कदा) कस्मिन् काले (चन) अपि वित्तं, मे, अस्येति पूर्ववत् ॥३॥

हे (देवाः) विद्वानो ! तुम लोगों से (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (परि) ऊपर (अदः) वह प्राप्त होनेहारा (स्वः) सुख (कदा, चन) कभी (मो, अव, पादि) विरुद्ध न उत्पन्न हुआ है। हम लोग (सोम्यस्य) ऐश्वर्य के योग्य (शंभुवः) सुख जिससे हो उस व्यवहार की (सु शूने) सुन्दर उन्नति में विरुद्ध भाव से चलनेहारे कभी (मा) (भूम) मत होवें। और अर्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥३॥

 

अन्वयः-

देवा युष्माभिर्दिवस्पर्य्यदः स्वः कदाचन मोऽवपादि वयं सोम्यस्य शंभुवः सुशूने विरुद्धकारिणः कदाचिन् मा भूम। अन्यत्पूर्ववत् ॥३॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरस्मिन् संसारे धर्मसुखविरुद्धं कर्मं नैवाचरणीयम्। पुरुषार्थेन सुखोन्नतिः सततं कार्या ॥३॥   

मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में धर्म और सुख से विरुद्ध काम नहीं करें और पुरुषार्थ से निरन्तर सुख की उन्नति करें ॥३॥

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