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Mantra Rig 01.104.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 104 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 18 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 101 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- स्वराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यु॒योप॒ नाभि॒रुप॑रस्या॒योः प्र पूर्वा॑भिस्तिरते॒ राष्टि॒ शूर॑: अ॒ञ्ज॒सी कु॑लि॒शी वी॒रप॑त्नी॒ पयो॑ हिन्वा॒ना उ॒दभि॑र्भरन्ते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

युयोप नाभिरुपरस्यायोः प्र पूर्वाभिस्तिरते राष्टि शूरः अञ्जसी कुलिशी वीरपत्नी पयो हिन्वाना उदभिर्भरन्ते

 

The Mantra's transliteration in English

yuyopa nābhir uparasyāyo pra pūrvābhis tirate rāṣṭi śūra | añjasī kuliśī vīrapatnī payo hinvānā udabhir bharante ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यु॒योप॑ नाभिः॑ उप॑रस्य आ॒योः प्र पूर्वा॑भिः ति॒र॒ते॒ राष्टि॑ शूरः॑ अ॒ञ्ज॒सी कु॒लि॒शी वी॒रऽप॑त्नी पयः॑ हि॒न्वा॒नाः उ॒दऽभिः॑ भ॒र॒न्ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

yuyopa | nābhi | uparasya | āyo | pra | pūrvābhi | tirate | rāṣṭi | śūra | añjasī | kuliśī | vīra-patnī | paya | hinvānā | uda-bhi | bharante ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०४।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कथं वर्त्तेयातामित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे वर्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(युयोप) युप्यति विमोहं करोति (नाभिः) बन्धनमिव (उपरस्य) मेघस्य। उपर इति मेघना०। निघं० १।१०। (आयोः) प्राप्तुं योग्यस्य। छन्दसीणः। उ० १।२। (प्र) (पूर्वाभिः) प्रजाभिस्सह (तिरते) प्लवते सन्तरति वा। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्। विकरणव्यत्ययेन शश्च। (राष्टि) राजते। अत्र विकरणस्य लुक्। (शूरः) निर्भयेन शत्रूणां हिंसिता (अञ्जसी) प्रसिद्धा (कुलिशी) कुलिशेन वज्रेणाभिरक्ष्या (वीरपत्नी) वीरः पतिर्यस्याः सा (पयः) जलम् (हिन्वानाः) प्रीतिकारिका नद्यः (उदभिः) उदकैः (भरन्ते) पुष्यन्ति। अत्र पक्षेऽन्तर्गतो ण्यर्थः ॥४॥

जब (शूरः) निडर शत्रुओं का मारनेवाला शूरवीर (प्र, पूर्वाभिः) प्रजाजनों के साथ (तिरते) राज्य का यथावत् न्यायकर पार होता और (राष्टि) उस राज्य में प्रकाशित होता है तब (आयोः) प्राप्त होने योग्य (उपरस्य) मेघ की (नाभिः) बन्धन चारों ओर से घुमड़ी हुई बादलों की दवन (युयोप) सबको मोहित करती है अर्थात् राजधर्म से प्रजासुख के लिये जलवर्षा भी होती है वह थोड़ी नहीं किन्तु (अञ्जसी) प्रसिद्ध (कुलिशी) जो सूर्य के किरणरूपी वज्र से सब प्रकार रही हुई अर्थात् सूर्य के विकट आतप से सूखने से बची हुई (वीरपत्नी) बड़ी-बड़ी नदी जिनसे बड़ा वीर समुद्र ही है वे (पयः) जल को (हिन्वानाः) हिड़ोलती हुई (उदभिः) जलों से (भरन्ते) भर जाती हैं ॥४॥

 

अन्वयः-

यदा शूरः प्रपूर्वाभिस्तिरते राज्यं संतरति तत्र राष्टि प्रकाशते तदायोरुपरस्य नाभिर्युयोप सा न न्यूना किन्त्वञ्जसी कुलिशी वीरपत्नी नद्यः पयो हिन्वाना उदभिर्भरन्ते ॥४॥

 

 

भावार्थः-

सुराज्येन सर्वसुखं प्रजासु भवति सुराज्येन विना दुःखं दुर्भिक्षं च भवति। अतो वीरपुरुषेण रीत्या राज्यपालनं कर्त्तव्यमिति ॥४॥

अच्छे राज्य से सब सुख प्रजा में होता है और विना अच्छे राज्य के दुःख और दुर्भिक्ष आदि उपद्रव होते हैं, इससे वीरपुरुषों को चाहिये कि रीति से राज्य पालन करें ॥४॥

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