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mantra Rig 01.103.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 103 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 16 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 91 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न्व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

धारयत्पृथिवीं पप्रथच्च वज्रेण हत्वा निरपः ससर्ज अहन्नहिमभिनद्रौहिणं व्यहन्व्यंसं मघवा शचीभिः

 

The Mantra's transliteration in English

sa dhārayat pthivīm paprathac ca vajrea hatvā nir apa sasarja | ahann ahim abhinad rauhia vy ahan vyasam maghavā śacībhi ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः धा॒र॒य॒त् पृ॒थि॒वीम् प॒प्रथ॑त् च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निः अ॒पः स॒स॒र्ज॒ अह॑न् अहि॑म् अभि॑नत् रौ॒हि॒णम् वि अह॑न् विऽअं॑सम् म॒घऽवा॑ शची॑भिः

 

The Pada Paath - transliteration

sa | dhārayat | pthivīm | paprathat | ca | vajrea | hatvā | ni | apa | sasarja | ahan | ahim | abhinat | rauhiam | vi | ahan | vi-asam | magha-vā | śacībhiḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०३।०२

मन्त्रविषयः-

अथैतस्मिञ्जगति तद्रचितोऽयं सूर्य्यः किं कर्माऽस्तीत्युपदिश्यते।

अब इस जगत् में परमेश्वर से बनाया हुआ यह सूर्य्य कौन काम करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(सः) (धारयत्) धरति (पृथिवीम्) भूमिम् (पप्रथत्) स्वतेजो विस्तार्य स्वेन तेजसा सर्व जगत् प्रकाशयति (च) एवं विद्युदादीन् (वज्रेण) किरणसमूहेन (हत्वा) (निः) निरन्तरम् (अपः) जलानि (ससर्ज) सृजति (अहन्) हन्ति (अहिम्) मेघम् (अभिनत्) भिनत्ति (रौहिणम्) रोहिण्यां प्रादुर्भूतम् (वि) (अहन्) हन्ति (व्यंसम्) विगता असा यस्य तम् (मघवा) सूर्यः (शचीभिः) कर्मभिः ॥२॥

हे मनुष्यो ! जो (मघवा) सूर्य्यलोक (शचीभिः) कामों से (पृथिवीम्) पृथिवी को (धारयत्) धारण करता अपने तेज (च) और बिजुली आदि को (पप्रथत्) फैलाता उस अपने तेज से सब जगत् को प्रकाशित करता (वज्रेण) अपने किरणसमूह से मेघ को (हत्वा) मारके (अपः) जलों को (निः) (ससर्ज) निरन्तर उत्पन्न करता फिर (अहिम्) मेघ को (अहन्) हनता (रौहिणम्) रोहिणी नक्षत्र में उत्पन्न हुए मेघ को (अभिनत्) विदारण करता (व्यंसम्) (वि, अहन्) केवल साधारण ही विदारता हो सो नहीं किन्तु कटि जाय भुजा आदि जिसकी ऐसे रुण्ड, मुण्ड, मुचण्ड, उद्दण्ड, वीर के समान विशेष करके मेघों को हनता है (सः) वह सूर्य्यलोक ईश्वर ने रचा है, यह जानो ॥२॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यो मघवा शचीभिः पृथिवीं धारयत्स्वतेजः पप्रथद्विद्युदादींश्च वज्रेण मेघं हत्वाऽपो निःससर्ज पुनरहिमहन् रौहिणमभिनत् न केवलं साधारणमेव हन्ति किन्तु व्यसं यता स्यात्तथा व्यहन् स ईश्वरेण रचितोऽस्तीति विजानीत ॥२॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरिदं द्रष्टव्यं प्रसिद्धो यः सूर्य्यलोकोऽस्ति स विदारणाकर्षणप्रकाशनादिकर्मभिर्वृष्टिं कृत्वा पृथिवीं धृत्वाऽव्यक्तपदार्थान् प्रकाश्य सर्वान् प्राणिनो व्यवहारयति स परमात्मनो रचनेन विना कदाचिदपि संभवितुं नार्हति ॥२॥

मनुष्यों को यह देखना चाहिये कि प्रसिद्ध जो सूर्यलोक है वह मेघों के विदारण, लोकों के खींचने और प्रकाश आदि कामों से जल, वर्षा, पृथिवी को धारण और अप्रकट अर्थात् अन्धकार से ढंपे हुए जो पदार्थ हैं उनको प्रकाशित कर सब प्राणियों को व्यवहार में चलाता है वह परमात्मा के बनाने के विना उत्पन्न नहीं हो सकता ॥२॥

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