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Mantra Rig 01.101.011

MANTRA NUMBER:

Mantra 11 of Sukta 101 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 13 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 78 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

म॒रुत्स्तो॑त्रस्य वृ॒जन॑स्य गो॒पा व॒यमिन्द्रे॑ण सनुयाम॒ वाज॑म् तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम् तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः

 

The Mantra's transliteration in English

marutstotrasya vjanasya gopā vayam indrea sanuyāma vājam | tan no mitro varuo māmahantām aditi sindhu pthivī uta dyau ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

म॒रुत्ऽस्तो॑त्रस्य वृ॒जन॑स्य गो॒पाः व॒यम् इन्द्रे॑ण स॒नु॒या॒म॒ वाज॑म् तत् नः॒ मि॒त्रः वरु॑णः म॒म॒ह॒न्ता॒म् अदि॑तिः सिन्धुः॑ पृ॒थि॒वी उ॒त द्यौः

 

The Pada Paath - transliteration

marut-stotrasya | vjanasya | gopā | vayam | indrea | sanuyāma | vājam | tat | na | mitra | varua | mamahantām | aditi | sindhu | pthivī | uta | dyauḥ ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०१।११

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(मरुत्स्तोत्रस्य) मरुतां वेगादिगुणैः स्तुतस्य (वृजनस्य) दुःखवर्जितस्य व्यवहारस्य (गोपाः) रक्षकः (वयम्) (इन्द्रेण) ऐश्वर्य्यप्रदेन सेनापतिना सह वर्त्तमानाः (सनुयाम) संभजेमहि। अत्र विकरणव्यत्ययः। (वाजम्) संग्रामम् (तत्) तस्मात् (नः) अस्मान् (मित्रो वरु०) इति पूर्ववत् ॥११॥

जो (मरुत्स्तोत्रस्य) पवन आदि के वेगादि गुणों से प्रशंसा को प्राप्त (वृजनस्य) और दुःखवर्जित अर्थात् जिसमें दुःख नहीं होता उस व्यवहार का (गोपाः) रखनेवाला सेनाधिपति है उस (इन्द्रेण) ऐश्वर्य के देनेवाले सेनापति के साथ वर्त्तमान (वयम्) हम लोग जिस कारण (वाजम्) संग्राम का (सनुयाम) सेवन करें (तत्) इस कारण (मित्रः) मित्र (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त जन (अदितिः) समस्त विद्वान् मण्डली (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्यलोक (नः) हम लोगों के (मामहन्ताम्) सत्कार करने के हेतु हों ॥११॥

 

अन्वयः-

यो मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा सेनाधिपतिरस्ति तेनेन्द्रेणैश्वर्यप्रदेन सह वर्त्तमाना वयं यतो वाजं सनुयाम तन्मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्नोऽस्मान्मामहन्तां सत्कारहेतवः स्युः ॥११॥

 

 

भावार्थः-

न खलु संग्रामे केषांचित् पूर्णबलेन सेनाधिपतिना विना शत्रुपराजयो भवितुं शक्यः। नैव किल कश्चित् सेनाधिपतिः सुशिक्षितया पूर्णबलया साङ्गोपाङ्गया हृष्टपुष्टया सेनया विना शत्रून् विजेतुं राज्यं पालयितुं च शक्नोति। नैतावदन्तरेण मित्रादयः सुखकारका भवितुं योग्यास्तस्मादेतत्सर्वं सर्वैर्मनुष्यैर्यथावन्मन्तव्यमिति ॥११॥

अत्रेश्वरसभासेनाशालाद्यध्यक्षाणां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति बोद्ध्यव्यम् ॥

इत्येकाधिकशततमं सूक्तं १०१ त्रयोदशो १३ वर्गश्च समाप्तः ॥

निश्चय है कि संग्राम में किसी पूर्णबली सेनाधिपति के विना शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता और न कोई सेनाधिपति अच्छी शिक्षा की हुई पूर्ण बल, अङ्ग और उपाङ्ग सहित आनन्दित और पुष्ट सेना के विना शत्रुओं के जीतने वा राज्य की पालना करने को समर्थ हो सकता है। न उक्त व्यवहारों के विना मित्र आदि सुख करने के योग्य होते हैं, इससे उक्त समस्त व्यवहार सब मनुष्यों को यथावत् मानना चाहिये ॥११॥

इस सूक्त में ईश्वर, सभा, सेना और शाला आदि के अधिपतियों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥

यह १०१ एकसौ एकवां सूक्त और १३ तेरहवां वर्ग समाप्त हुआ ॥

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