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Mantra Rig 01.101.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 101 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 12 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 72 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यो विश्व॑स्य॒ जग॑तः प्राण॒तस्पति॒र्यो ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मो गा अवि॑न्दत् इन्द्रो॒ यो दस्यूँ॒रध॑राँ अ॒वाति॑रन्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत् इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे

 

The Mantra's transliteration in English

yo viśvasya jagata prāatas patir yo brahmae prathamo gā avindat | indro yo dasyūm̐r adharām̐ avātiran marutvanta sakhyāya havāmahe  

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यः विश्व॑स्य जग॑तः प्रा॒ण॒तः पतिः॑ यः ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मः गाः अवि॑न्दत् इन्द्रः॑ यः दस्यू॑न् अध॑रान् अ॒व॒ऽअति॑रत् म॒रुत्व॑न्तम् स॒ख्याय॑ ह॒वा॒म॒हे॒

 

The Pada Paath - transliteration

ya | viśvasya | jagata | prāata | pati | ya | brahmae | prathama | gā | avi ndat | indra | ya | dasyūn | adharān | ava-atirat | marutvantam | sakhyāya | havāmahe ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०१।०५

मन्त्रविषयः-

अथ सेनाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते।

अब सेनाध्यक्ष कैसा होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यः) सेनापतिः (विश्वस्य) समग्रस्य (जगतः) जङ्गमस्य (प्राणतः) प्राणतो जीवतः। अत्र षष्ठ्याः पतिपुत्र०। (अ० ८।३।५३।) इति विसर्जनीयस्य सः। (पतिः) अधिष्ठाता (यः) प्रदाता (ब्रह्मणे) चतुर्वेदविदे (प्रथमः) सर्वस्य प्रथयिता। अत्र प्रथेरमच्। उ० ५।६८। (गाः) पृथिवीरिन्द्रियाणि प्रकाशयुक्तान् लोकान् वा (अविन्दन्) प्राप्नोति (इन्द्रः) इन्द्रियवान् जीवः (यः) शौर्यादिगुणयुक्तः (दस्यून्) सहसा परपदार्थहर्त्तॄन् (अधरान्) नीचान् (अवातिरत्) अधःप्रापयति (मरुत्वन्त०) इति पूर्ववत् ॥५॥

(यः) जो उत्तमदानशील (प्रथमः) सबका विख्यात करनेवाला (इन्द्रः) इन्द्रियों से युक्त जीव (ब्रह्मणे) चारों वेदों के जाननेवाले के लिये (गाः) पृथिवी, इन्द्रियों और प्रकाशयुक्त लोकों को (अविन्दत्) प्राप्त होता वा (यः) जो शूरता आदि गुणवाला वीर (दस्यून्) हठ से औरों का धन हरनेवालों को (अधरान्) नीचता को प्राप्त कराता हुआ (अवातिरत्) अधोगति को पहुंचाता वा (यः) जो सेनाधिपति (विश्वस्य) समग्र (जगतः) जङ्गमरूप (प्राणतः) जीवते जीवसमूह का (पतिः) अधिपति अर्थात् स्वामी हो उस (मरुत्वन्तम्) अपने समीप पढ़ानेवालों को रखनेवाले सभाध्यक्ष को हम लोग (सख्याय) मित्रपन के लिये (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥५॥

 

अन्वयः-

यः प्रथम इन्द्रो ब्रह्मणे गा अविन्दत्। यो दस्यूनधरानवातिरत्। यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्वर्त्तते तं मरुत्वन्तं सख्याय वयं हवामहे ॥५॥

 

 

भावार्थः-

पुरुषार्थेन विना विद्याऽन्नधनप्राप्तिर्न जायते शत्रुपराजयश्च। यो धार्मिकः सेनाध्यक्षः सुहृद्भावेन स्वप्राणवत्सर्वान्प्रीणयति तस्य कदाचित्खलु दुःखं न जायते तस्मादेतत्सदाचरणीयम् ॥५॥

पुरुषार्थ के विना विद्या, अन्न और धन की प्राप्ति तथा शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता, जो धार्मिक सेनाध्यक्ष सुहृद्भाव से अपने प्राण के समान सबको प्रसन्न करता है उस पुरुष को निश्चय है कि कभी दुःख नहीं होता, इससे उक्त विषय का आचरण सदा करना चाहिये ॥५॥

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