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Mantra Rig 01.101.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 101 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 12 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 69 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कुत्सः आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यो व्यं॑सं जाहृषा॒णेन॑ म॒न्युना॒ यः शम्ब॑रं॒ यो अह॒न्पिप्रु॑मव्र॒तम् इन्द्रो॒ यः शुष्ण॑म॒शुषं॒ न्यावृ॑णङ्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम् इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे

 

The Mantra's transliteration in English

yo vyasa jāhṛṣāena manyunā ya śambara yo ahan piprum avratam | indro ya śuṣṇam aśua ny āvṛṇa marutvanta sakhyāya havāmahe ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यः विऽअं॑सम् ज॒हृ॒षा॒णेन॑ म॒न्युना॑ यः शम्ब॑रम् यः अह॑न् पिप्रु॑म् अ॒व्र॒तम् इन्द्रः॑ यः शुष्ण॑म् अ॒शुष॑म् नि अवृ॑णक् म॒रुत्व॑न्तम् स॒ख्याय॑ ह॒वा॒म॒हे॒

 

The Pada Paath - transliteration

ya | vi-asam | jahṛṣāena | manyunā | ya | śambaram | ya | ahan | piprum | avratam | indra | ya | śuṣṇam | aśuam | ni | avṛṇak | marutvantam | sakhyāya | havāmahe ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१०१।०२

मन्त्रविषयः-

अथ सभासेनाध्यक्षः किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

अब सभा और सेना का अध्यक्ष क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यः) सभासेनाध्यक्षः (व्यंसम्) विगता अंसाः स्कन्धा यस्य तत् (जाहृषाणेन) सज्जनानां सन्तोषकेन। अत्र हृष तुष्टावित्यस्माल्लिटः कानच्। तुजादित्वाद्दीर्घश्च (मन्युना) क्रोधेन (यः) शौर्यादिगुणोपेतो वीरः (शम्बरम्) अधर्मसम्बन्धिनम्। अत्र शम्बधातोरौणादिकोऽरन् प्रत्ययः। (यः) धर्मात्मा (अहन्) हन्यात् (पिप्रुम्) उदरम्भरम्। अत्र पृधातोर्बाहुलकादौणादिकः कुः प्रत्ययः सन्वद्भावश्च। (अव्रतम्) ब्रह्मचर्यरीत्याचरणादिनियमपालनरहितम् (इन्द्रः) सकलैश्वर्ययुक्तः (यः) अतिबलवान् (शुष्णम्) बलवन्तम् (अशुषम्) शोकरहितं हर्षितम् (नि) (अवृणक्) वर्जयेत्। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (मरुत्वन्तं०) इति पूर्ववत् ॥२॥

(यः) जो सभा सेना आदि का अधिपति (इन्द्रः) समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त (जाहृषाणेन) सज्जनों को सन्तोष देनेवाले (मन्युना) अपने क्रोधों से दुष्ट और शत्रुजनों को (व्यंसम् नि, अहन्) ऐसा मारे कि जिससे कन्धा अलग हो जाए वा (यः) जो शूरता आदि गुणों से युक्त वीर (शम्बरम्) अधर्म से सम्बन्ध करनेवाले को अत्यन्त मारे वा (यः) धर्मात्मा सज्जन पुरुष (पिप्रुम्) जो कि अधर्मी अपना पेट भरता उसको निरन्तर मारे और (यः) जो अति बलवान् (अव्रतम्) जिसके कोई नियम नहीं अर्थात् ब्रह्मचर्य सत्यपालन आदि व्रतों को नहीं करता उसको (अवृणक्) अपने से अलग करे, उस (शुष्णम्) बलवान् (अशुषम्) शोकरहित हर्षयुक्त (मरुत्वन्तम्) अच्छे प्रशंसित पढ़नेवालों को रखनेहारे सकल ऐश्वर्ययुक्त सभापति को (सख्याय) मित्रों के काम वा मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥२॥

 

अन्वयः-

य इन्द्रो जाहृषाणेन मन्युना दुष्टं शत्रुं व्यंसं न्यहन् यः शम्बरं न्यहन्। यः पिप्रुं न्यहन् योऽव्रतमवृणक् शुष्णमशुषं मरुत्वन्तमिन्द्रं सख्याय वयं हवामहे स्वीकुर्मः ॥२॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्यः प्रदीप्तेन क्रोधेन दुष्टान् हत्वा विद्योन्नतये ब्रह्मचर्यादि व्रतानि प्रचार्याविद्याकुशिक्षा निषिध्य सर्वेषां सुखाय सततं प्रयतते स एव सुहृन्मन्तव्यः ॥२॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो चमकते हुए क्रोध से दुष्टों को मारकर विद्या की उन्नति के लिये ब्रह्मचर्यादि नियमों को प्रचरित और मूर्खपन और खोटी सिखावटों को रोकके सबके सुखके लिये निरन्तर अच्छा यत्न करे, वही मित्र मानने योग्य है ॥२॥

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