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Mantra Rig 01.100.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 100 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 10 of Adhyaya 7 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 15 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेव भयमानसुराधसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यस्याज॑स्रं॒ शव॑सा॒ मान॑मु॒क्थं प॑रिभु॒जद्रोद॑सी वि॒श्वत॑: सीम् पा॑रिष॒त्क्रतु॑भिर्मन्दसा॒नो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यस्याजस्रं शवसा मानमुक्थं परिभुजद्रोदसी विश्वतः सीम् पारिषत्क्रतुभिर्मन्दसानो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती

 

The Mantra's transliteration in English

yasyājasra śavasā mānam uktham paribhujad rodasī viśvata sīm | sa pāriat kratubhir mandasāno marutvān no bhavatv indra ūtī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यस्य॑ अज॑स्रम् शव॑सा मान॑म् उ॒क्थम् प॒रि॒ऽभु॒जत् रोद॑सी॒ इति॑ वि॒श्वतः॑ सी॒म् सः पा॒रि॒ष॒त् क्रतु॑ऽभिः म॒न्द॒सा॒नः म॒रुत्वा॑न् नः॒ भ॒व॒तु॒ इन्द्रः॑ ऊ॒ती

 

The Pada Paath - transliteration

yasya | ajasram | śavasā | mānam | uktham | pari-bhujat | rodasī iti | viśvata | sīm | sa | pāriat | kratu-bhi | mandasāna | marutvān | na | bhavatu | indra | ūtī ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–१००।१४

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (अजस्रम्) सततम् (शवसा) शरीरात्मबलेन (मानम्) सत्कारम् (उक्थम्) वेदविद्याः (परिभुजत्) सर्वतो भुञ्ज्यात् पालयेत्। अत्र भुजधातोर्लिटि विकरणव्यत्ययेन शः। (रोदसी) विद्याप्रकाशपृथिवीराज्ये (विश्वतः) सर्वतः (सीम्) धर्म्मन्यायमर्य्यादापरिग्रहे। सीमिति परिग्रहार्थीयः। निरु० १।७। (सः) (पारिषत्) सुखैः प्रजाः पालयेत्। अत्र पृधातोर्लेटि सिप्। सिब्बहुलं छन्दसि णित्। इति वार्त्तिकेन णित्वाद् वृद्धिः। (क्रतुभिः) श्रेष्ठैः कर्मभिः सह (मन्दसानः) प्रशंसादियुक्तः (मरुत्वान्नो०) इति पूर्ववत् ॥१४॥

(यस्य) जिस सभा आदि के अधीश के (शवसा) शारीरिक तथा आत्मिक बल से युक्त प्रजाजन (मानम्) सत्कार (उक्थम्) वेदविद्या तथा (सीम्) धर्म न्याय की मर्यादा को (विश्वतः) सब ओर से (अजस्रम्) निरन्तर पालन और जो (रोदसी) विद्या के प्रकाश और पृथिवी के राज्य को भी (परिभुजत्) अच्छे प्रकार पालन करे। जो (क्रतुभिः) उत्तम बुद्धिमानी के कामों के साथ (मन्दसानः) प्रशंसा आदि से परिपूर्ण हुआ सुखों से प्रजाओं को (पारिषत्) पालता है (सः) वह (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम वीरों का रखनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् सभापति (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार को सिद्ध करनेवाला निरन्तर (भवतु) होवे ॥१४॥

 

अन्वयः-

यस्य शवसा प्रजाः मानुमुक्थं सीं विश्वतोऽजस्रं परिभुजद्रोदसी च यः क्रतुभिर्मन्दसानः सुखैः प्रजाः पारिषत् स मरुत्वानिन्द्रो न ऊत्यजस्रं भवतु ॥१४॥

 

 

भावार्थः-

यः सत्पुरुषाणां मानं दुष्टानां परिभवं पूर्णां विद्याधर्ममर्य्यादां पुरुषार्थमानन्दं च कर्त्तुं शक्नुयात् स एव सभाद्यध्यक्षाद्यधिकारमर्हेत् ॥१४॥

जो सत्पुरुषों का मान, दुष्टों का तिरस्कार, पूरी विद्या, धर्म की मर्यादा, पुरुषार्थ और आनन्दकर सके वही सभाध्यक्षादि अधिकार के योग्य हो ॥१४॥

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