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Mantra Rig 01.093.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 93 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 28 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 96 of Anuvaak 14 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणपुत्रः

देवता (Devataa) :- अग्नीषोमौ

छन्द: (Chhand) :- भुरिगुष्णिक्

स्वर: (Swar) :- ऋषभः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अग्नी॑षोमा॒ यो अ॒द्य वा॑मि॒दं वच॑: सप॒र्यति॑ तस्मै॑ धत्तं सु॒वीर्यं॒ गवां॒ पोषं॒ स्वश्व्य॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अग्नीषोमा यो अद्य वामिदं वचः सपर्यति तस्मै धत्तं सुवीर्यं गवां पोषं स्वश्व्यम्

 

The Mantra's transliteration in English

agnīomā yo adya vām ida vaca saparyati | tasmai dhatta suvīrya gavām poa svaśvyam ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अग्नी॑षोमा यः अ॒द्य वा॒म् इ॒दम् वचः॑ स॒प॒र्यति॑ तस्मै॑ ध॒त्त॒म् सु॒ऽवीर्य॑म् गवा॑म् पोष॑म् सु॒ऽअश्व्य॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

agnīomā | ya | adya | vām | idam | vaca | saparyati | tasmai | dhattam | su-vīryam | gavām | poam | su-aśvyam ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०९३।०२

मन्त्रविषयः

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ।

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

 

पदार्थः

(अग्नीषोमा) अध्यापकसुपरीक्षकौ । अत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः । (यः) अध्येता (अद्य) (वाम्) युवयोः (इदम्) (वचः) वचनम् (सपर्य्यति) (तस्मै) (धत्तम्) प्रयच्छतम् (सूवीर्यम्) शोभनानि वीर्य्याणि यस्माद्विद्याभ्यासात्तम् (गवाम्) इन्द्रियाणां पशूनां वा (पोषम्) शरीरात्मपुष्टिकारकम् (स्वश्व्यम्) शोभनेष्वश्वेषु साधुम् ॥२॥

हे (अग्नीषोमा) पढ़ाने और परीक्षा लेनेवाले विद्वानो ! (यः) जो पढ़नेवाला (अद्य) आज (वाम्) तुम्हारे (इदम्) इस (वचः) विद्या के वचन को (सपर्यति) सेवे (तस्मै) उसके लिये (स्वश्व्यम्) जो अच्छे-अच्छे घोड़ों से युक्त (सुवीर्य्यम्) उत्तम-उत्तम बल जिस विद्याभ्यास से हों, उस (गवाम्) इन्द्रिय और गाय आदि पशुओं के (पोषम्) सर्वथा शरीर और आत्मा की पुष्टि करनेहारे सुख को (धत्तम्) दीजिये ॥२॥

 

अन्वयः

हे अग्नीषोमावध्यापकसुपरीक्षकौ योऽद्य वामिदं वचः सपर्यति तस्मै स्वश्व्यं सुवीर्य्यं गवां पोषं च धत्तम् ॥२॥

 

 

भावार्थः

यो ब्रह्मचारी विद्यार्थमध्यापकपरीक्षकौ प्रति सुप्रीतिं कृत्वैनौ नित्यं सेवते स एव महाविद्वान् भूत्वा सर्वाणि सुखानि लभते ॥२॥

जो ब्रह्मचारी विद्या के लिये पढ़ाने और परीक्षा करनेवालों के प्रति उत्तम प्रीति को करके और उनकी नित्य सेवा करता है, वही बड़ा विद्वान् होकर सब सुखों को पाता है ॥२॥







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