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Mantra Rig 01.090.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 90 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 18 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 51 of Anuvaak 14 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑वं॒ रज॑: मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः मधु द्यौरस्तु नः पिता

 

The Mantra's transliteration in English

madhu naktam utoaso madhumat pārthiva raja | madhu dyaur astu na pitā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मधु॑ नक्त॑म् उ॒त उ॒षसः॑ मधु॑ऽमत् पार्थि॑वम् रजः॑ मधु॑ द्यौः अ॒स्तु॒ नः॒ पि॒ता

 

The Pada Paath - transliteration

madhu | naktam | uta | uasa | madhu-mat | pārthivam | raja | madhu | dyau | astu | na | pitā ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०९०।०७

मन्त्रविषयः-

पुनर्वयं कस्मै कं पुरुषार्थं कुर्य्यामेत्युपदिश्यते।

फिर हम किसके लिये किस पुरुषार्थ को करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(मधु) मधुरा (नक्तम्) रात्रिः (उत) अपि (उषसः) दिवसानि (मधुमत्) मधुरगुणयुक्तम् (पार्थिवम्) पृथिव्यां विदितम् (रजः) अनुत्रसरेण्वादि (मधु) माधुर्यसुखकारिका (द्यौः) सूर्यकान्तिः (अस्तु) भवतु (नः) अस्मभ्यम् (पित) पालकः ॥७॥

हे विद्वानो ! जैसे (नः) हम लोगों के लिये (नक्तम्) रात्रि (मधु) मधुर (उषसः) दिन मधुर गुणवाले (पार्थिवम्) पृथिवी में (रजः) अणु और त्रसरेणु आदि छोटे-छोटे भूमि के कण के (मधुमत्) मधुर गुणों से युक्त सुख करनेवाले (उत) और (पिता) पालन करनेवाली (द्यौः) सूर्य्य की कान्ति (मधु) मधुरगुणवाली (अस्तु) हो वैसे तुम लोगों के लिये भी हो ॥७॥

 

अन्वयः-

हे विद्वांसो यथा नोऽस्मभ्यं नक्तं मधूषसो मधूनि पार्थिवं रजो मधुमदुत पिता द्यौर्मध्वस्तु तथा युष्मभ्यमप्येते स्युः ॥७॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। अध्यापकैर्यथा मनुष्येभ्यः पृथिवीस्थाः पदार्था आनन्दप्रदाः स्युस्तथा गुणज्ञानेन हस्तक्रियया च विद्योपयोगः सर्वैरनुष्ठेयः ॥७॥

पढ़ानेवाले लोगों से जैसे मनुष्यों के लिये पृथिवीस्थ पदार्थ आनन्ददायक हों, वैसे सब मनुष्यों को गुण, ज्ञान और हस्तक्रिया से विद्या का उपयोग करना चाहिये ॥७॥

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