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Mantra Rig 01.090.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 90 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 17 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 48 of Anuvaak 14 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- विश्वेदेवा:

छन्द: (Chhand) :- विराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वि न॑: प॒थः सु॑वि॒ताय॑ चि॒यन्त्विन्द्रो॑ म॒रुत॑: पू॒षा भगो॒ वन्द्या॑सः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वि नः पथः सुविताय चियन्त्विन्द्रो मरुतः पूषा भगो वन्द्यासः

 

The Mantra's transliteration in English

vi na patha suvitāya ciyantv indro maruta | pūā bhago vandyāsa ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वि नः॒ प॒थः सु॒वि॒ताय॑ चि॒यन्तु॑ इन्द्रः॑ म॒रुतः॑ पू॒षा भगः॑ वन्द्या॑सः

 

The Pada Paath - transliteration

vi | na | patha | suvitāya | ciyantu | indra | maruta | pūā | bhaga | vandyāsaḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०९०।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे वर्त्ते, यह उपदेश अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(वि) विशेषार्थे (नः) अस्मान् (पथः) उत्तममार्गान् (सुविताय) ऐश्वर्यप्राप्तये (चियन्तु) चिन्वन्तु। अत्र बहुलं छन्दसीति विकरणलुक् इयङादेशश्च। (इन्द्रः) विद्यैश्वर्यवान् (मरुतः) मनुष्याः (पूषा) पोषकः (भगः) सौभाग्यवान् (वन्द्यासः) स्तोतव्याः सत्कर्त्तव्याश्च ॥४॥

जो (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य्ययुक्त वा (पूषा) दूसरे का पोषण पालन करनेवाला (भगः) और उत्तम भाग्यशाली (वन्द्यासः) स्तुति और सत्कार करने योग्य (मरुतः) मनुष्य हैं वे (नः) हम लोगों को (सुविताय) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (पथः) उत्तम मार्गों को (वि, चियन्तु) नियत करें ॥४॥

 

अन्वयः-

य इन्द्रः पूषा भगश्च वन्द्यासो मरुतस्ते नोऽस्मान्सुविताय पथो विचियन्तु ॥४॥

 

 

भावार्थः-

विद्वद्भिर्मनुष्यैरैश्वर्यं पुष्टिं सौभाग्यं प्राप्यान्येपि तादृशा सौभाग्यवन्तः कर्त्तव्याः ॥४॥ 

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से ऐश्वर्य पुष्टि और सौभाग्य पाकर उस सौभाग्य की योग्यता को औरों को भी प्राप्त करावें ॥४॥

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