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Mantra Rig 01.086.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 86 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 12 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 14 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

पू॒र्वीभि॒र्हि द॑दाशि॒म श॒रद्भि॑र्मरुतो व॒यम् अवो॑भिश्चर्षणी॒नाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

पूर्वीभिर्हि ददाशिम शरद्भिर्मरुतो वयम् अवोभिश्चर्षणीनाम्

 

The Mantra's transliteration in English

pūrvībhir hi dadāśima śaradbhir maruto vayam | avobhiś caraīnām ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

पू॒र्वीभिः॑ हि द॒दा॒शि॒म श॒रत्ऽभिः॑ म॒रु॒तः॒ व॒यम् अवः॑ऽभिः च॒र्ष॒णी॒नाम्

 

The Pada Paath - transliteration

pūrvībhi | hi | dadāśima | śarat-bhi | maruta | vayam | ava-bhi | caraīnām ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०८६।०६

मन्त्रविषयः

सर्वे वयं मिलित्वा किं कुर्य्यामेत्युपदिश्यते ।

सब हम मिल के क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

 

पदार्थः

(पूर्वीभिः) पुरातनीभिः (हि) खलु (ददाशिम) दद्याम (शरद्भिः) शरदादिभिर्ऋतुभिः (मरुतः) सभाद्यध्यक्षादयः (वयम्) सभाप्रजाशालास्थाः (अवोभिः) रक्षणादिभिः (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम् ॥६॥

हे (मरुतः) सभाध्यक्ष आदि सज्जनो ! जैसे तुम लोग (पूर्वीभिः) प्राचीन सनातन (शरद्भिः) सब ऋतु वा (अवोभिः) रक्षा आदि अच्छे-अच्छे व्यवहारों से (चर्षणीनाम्) सब मनुष्यों के सुख के लिये अच्छे प्रकार अपना वर्त्ताव वर्त्त रहे हो, वैसे (हि) निश्चय से (वयम्) हम प्रजा, सभा और पाठशालास्थ आदि प्रत्येक शाला के पुरुष आप लोगों को सुख (ददाशिम) देवें ॥६॥

 

अन्वयः

हे मरुतो ! यथा यूयं पूर्वीभिः शरद्भिः सर्वैर्ऋतुभिरवोभिश्चर्षणीनां सुखाय प्रवर्त्तध्वम् । तथा वयमपि हि खलु युष्मदादिभ्यः सुखानि ददाशिम ॥६॥

 

 

भावार्थः

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यथा ऋतुस्था वायवः प्राणिनो रक्षित्वा सुखयन्ति तथा विद्वांसः सर्वेषां सुखाय प्रवर्त्तेरन्, न किल कस्यचिद् दुःखाय ॥६॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे सब ऋतु में ठहरनेवाले वायु प्राणियों की रक्षा कर उनको सुख पहुँचाते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सबके सुख के लिये प्रवृत्त हों, न कि किसी के दुःख के लिये ॥६॥








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