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Mantra Rig 01.086.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 86 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 11 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 13 of Anuvaak 14 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मरु॑तो॒ यस्य॒ हि क्षये॑ पा॒था दि॒वो वि॑महसः सु॑गो॒पात॑मो॒ जन॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः सुगोपातमो जनः

 

The Mantra's transliteration in English

maruto yasya hi kaye pāthā divo vimahasa | sa sugopātamo jana ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मरु॑तः यस्य॑ हि क्षये॑ पा॒थ दि॒वः वि॒ऽम॒ह॒सः॒ सः सु॒ऽगो॒पात॑मः जनः॑

 

The Pada Paath - transliteration

maruta | yasya | hi | kaye | pātha | diva | vi-mahasa | sa | su-gopātama | janaḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८६।०१

मन्त्रविषयः-

पुनः स गृहस्थः कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह गृहस्थ कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(मरुतः) प्राणा इव प्रिया विद्वांसः (यस्य) (हि) खलु (क्षये) गृहे (पाथ) रक्षका भवथ। अत्र द्व्यचोतस्तिङ इति दीर्घः। (दिवः) विद्यान्यायप्रकाशकाः (विमहसः) विविधानि महांसि पूज्यानि कर्माणि येषां तत्सम्बुद्धौ (सः) (सुगोपातमः) अतिशयेन सुष्ठु स्वस्यान्येषां च रक्षकः (जनः) मनुष्यः ॥१॥

हे (विमहसः) नाना प्रकार पूजनीय कर्मों के कर्त्ता ! (दिवः) विद्यान्यय प्रकाशक तुम लोग (मरुतः) वायु के समान विद्वान् जन (यस्य) जिसके (क्षये) घर में (पाथ) रक्षक हो (स हि) वही (सुगोपातमः) अच्छे प्रकार (जनः) मनुष्य होवे ॥१॥

 

अन्वयः-

हे विमहसो दिवो यूयं मरुतो यस्य क्षये पाथ सं हि खलु सुगोपातमो जनो जायेत ॥१॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा प्राणेन विना शरीरादिरक्षणं न सम्भवति तथैव सत्योपदेशकेन विना प्रजारक्षणं न जायते ॥१॥

जैसे प्राण के विना शरीरादि का रक्षण नहीं हो सकता वैसे सत्योपदेशकर्त्ता के विना प्रजा की रक्षा नहीं होती ॥१॥

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