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Mantra Rig 01.084.020

MANTRA NUMBER:

Mantra 20 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 8 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 98 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृदास्तारपङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मा ते॒ राधां॑सि॒ मा त॑ ऊ॒तयो॑ वसो॒ऽस्मान्कदा॑ च॒ना द॑भन् विश्वा॑ उपमिमी॒हि मा॑नुष॒ वसू॑नि चर्ष॒णिभ्य॒

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मा ते राधांसि मा ऊतयो वसोऽस्मान्कदा चना दभन् विश्वा उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य

 

The Mantra's transliteration in English

mā te rādhāsi mā ta ūtayo vaso 'smān kadā canā dabhan | viśvā ca na upamimīhi mānua vasūni caraibhya ā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मा ते॒ राधां॑सि मा ते॒ ऊ॒तयः॑ वसो॒ इति॑ अ॒स्मान् कदा॑ च॒न द॒भ॒न् विश्वा॑ च॒ नः॒ उ॒प॒ऽमि॒मी॒हि मा॒नु॒ष॒ वसू॑नि च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑

 

The Pada Paath - transliteration

mā | te | rādhāsi | mā | te | ūtaya | vaso iti | asmān | kadā | cana | dabhan | viśvā | ca | na | upa-mimīhi | mānua | vasūn i | carai-bhya | ā ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।२०

मन्त्रविषयः-

पुनः स सभाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(मा) निषेधे (ते) (राधांसि) धनानि (मा) (ते) (ऊतयः) रक्षणादीनि कर्माणि (वसो) सुखेषु वासयितः (अस्मान्) (कदा) (चन) कस्मिन्नपि काले (दभन्) हिंस्युः (विश्वा) सर्वाणि (च) समुच्चये (नः) अस्मान् (उपमिमीहि) श्रेष्ठैरुपमितान् कुरु (मानुष) मनुष्यस्वभावयुक्त (वसूनि) विज्ञानादिधनानि (चर्षणिभ्यः) उत्तमेभ्यो मनुष्येभ्यः (आ) अभितः ॥२०॥

हे (वसो) सुख में वास करनेहारे ! (ते) आपके (राधांसि) धन (अस्मान्) हमको (कदाचन्) कभी भी (मा दभन्) दुःखदायक न हों (ते) तेरी (ऊतयः) रक्षा (अस्मान्) हमको (मा) मत दुःखदायी होवे। हे (मानुष)  जैसे तू (चर्षणिभ्यः) उत्तम मनुष्यों को (विश्वा) विज्ञान आदि सब प्रकार के (वसूनि) धनों को देता है वैसे हमको भी दे (च) और (नः) हमको विद्वान् धार्मिकों की (आ) सब ओर से (उपमिमीहि) उपमा को प्राप्त कर ॥२०॥

 

अन्वयः-

हे वसो ते राधांस्यस्मान् कदाचनमा दभन्। त ऊतयोऽस्मान्मा हिंसन्तु। हे मानुष  यथा त्वं चर्षणिभ्यो विश्वा वसूनि ददासि तथा च नोऽस्मानोपमिमीहि ॥२०॥


 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। त एव धार्मिका मनुष्याः सन्ति येषां तनुर्मनो धनानि च सर्वान् सुखयेयुः। त एव प्रशंसिता भवन्ति ये च जगदुपकाराय प्रयतन्त इति ॥२०॥

अस्मिन् सूक्ते सेनापतिगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति वेद्यम् ॥

इति चतुरशीतितमं सूक्तमष्टमो वर्गश्च समाप्तः ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही धार्मिक मनुष्य हैं जिनका शरीर, मन और धन सबको सुखी करें, वे ही प्रशंसा के योग्य हैं जो जगत् के उपकार के लिये प्रयत्न करते हैं ॥२०॥

इस सूक्त में सेनापति के गुण वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की संगति पूर्व सूक्तार्थ के संग जाननी चाहिये ॥

यह ८४ चौरासीवाँ सूक्त और वां वर्ग समाप्त हुआ ॥

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