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Mantra Rig 01.084.019

MANTRA NUMBER:

Mantra 19 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 8 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 97 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- आर्चीत्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वम॒ङ्ग प्र शं॑सिषो दे॒वः श॑विष्ठ॒ मर्त्य॑म् त्वद॒न्यो म॑घवन्नस्ति मर्डि॒तेन्द्र॒ ब्रवी॑मि ते॒ वच॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वमङ्ग प्र शंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः

 

The Mantra's transliteration in English

tvam aga pra śasio deva śaviṣṭha martyam | na tvad anyo maghavann asti maritendra bravīmi te vaca ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वम् अ॒ङ्ग प्र शं॒सि॒षः॒ दे॒वः श॒वि॒ष्ठ॒ मर्त्य॑म् त्वत् अ॒न्यः म॒घ॒ऽव॒न् अ॒स्ति॒ म॒र्डि॒ता इन्द्र॑ ब्रवी॑मि ते॒ वचः॑

 

The Pada Paath - transliteration

tvam | aga | pra | śasia | deva | śaviṣṭha | martyam | na | tvat | anya | magha-van | asti | maritā | indra | bravīmi | te | vacaḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।१९

मन्त्रविषयः-

पुनरीश्वरसभाद्यध्यक्षौ कीदृशौ जानीयादित्युपदिश्यते।

फिर ईश्वर और सभा आदि के अध्यक्षों को कैसे जानें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा हैं।

 

पदार्थः-

(त्वम्) (अङ्ग) मित्र (प्र) (शंसिषः) प्रशंसेः (देवः) दिव्यगुणः (शविष्ठ) अतिबलयुक्त (मर्त्यम्) मनुष्यम् (न) निषेधे (त्वत्) (अन्यः) भिन्नः (मघवन्) परमधनप्रापक (अस्ति) (मर्डिता) सुखप्रदाता (इन्द्र) दुःखविदारक (ब्रवीमि) उपदिशामि (ते) तुभ्यम् (वचः) धर्म्यं वचनम् ॥१९॥

हे (अङ्ग) मित्र (शिवष्ठ) परम बलयुक्त ! जिससे (त्वम्) तू (देवः) विद्वान् है उससे (मर्त्यम्) मनुष्य को (प्रशंसिषः) प्रशंसित कर। हे (मघवन्) उत्तम धन के दाता (इन्द्र) दुःखो का नाशक ! जिससे (त्वम्) तुझसे (अन्यः) भिन्न कोई भी (मर्डिता) सुखदायक (नास्ति) नहीं है, उससे (ते) तुझे (वचः) धर्म्मयुक्त वचनों का (ब्रवीमि) उपदेश करता है ॥१९॥

 

अन्वयः-

हे अङ्ग शविष्ठ यतस्त्वं देवोसि तस्मान् मर्त्यं प्रशंसिषः। हे मघवन्निन्द्र यतस्त्वदन्यो मर्डिता सुखप्रदाता नाऽस्ति तस्मात् ते वचो ब्रवीमि ॥१९॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैः प्रशंसितकर्मणानुपमेन सततं सुखप्रदेन धार्मिकेण मनुष्येण सदैव मित्रतां कृत्वा परस्परं हितोपदेशः कर्तव्यः ॥१९॥

मनुष्यों को योग्य है कि उत्तम कर्म करने असाधारण सदा सुख देनेहारे धार्मिक मनुष्यों के साथ ही मित्रता करके एक दूसरे को सुख देने का उपदेश किया करें ॥१९॥

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