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Mantra Rig 01.084.017

MANTRA NUMBER:

Mantra 17 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 8 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 95 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ई॑षते तु॒ज्यते॒ को बि॑भाय॒ को मं॑सते॒ सन्त॒मिन्द्रं॒ को अन्ति॑ कस्तो॒काय॒ इभा॑यो॒त रा॒येऽधि॑ ब्रवत्त॒न्वे॒३॒॑ को जना॑य

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ईषते तुज्यते को बिभाय को मंसते सन्तमिन्द्रं को अन्ति कस्तोकाय इभायोत रायेऽधि ब्रवत्तन्वे को जनाय

 

The Mantra's transliteration in English

ka īate tujyate ko bibhāya ko masate santam indra ko anti | kas tokāya ka ibhāyota rāye 'dhi bravat tanve ko janāya ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

कः ई॒ष॒ते॒ तु॒ज्यते॑ कः बि॒भा॒य॒ कः मं॒स॒ते॒ सन्त॑म् इन्द्र॑म् कः अन्ति॑ कः तो॒काय॑ कः इभा॑य उ॒त रा॒ये अधि॑ ब्र॒व॒त् त॒न्वे॑ कः जना॑य

 

The Pada Paath - transliteration

ka | īate | tujyate | ka | bibhāya | ka | masate | santam | indram | ka | anti | ka | tokāya | ka | ibhāya | uta | rāye | adhi | bravat | tanve | ka | janāya ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।१७

मन्त्रविषयः-

अथ प्रश्नोत्तरै राजधर्ममुपदिश्यते।

अब अगले मन्त्र में प्रश्नोत्तर से राजधर्म का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(कः) कश्चित् (ईषते) युद्धमिच्छेत् (तुज्यते) हिंस्यते (कः) (बिभाय) विभेति (कः) (मंसते) मन्यते (सन्तम्) राजव्यवहारेषु वर्त्तमानम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यकारकम् (कः) (अन्ति) समीपे (कः) (तोकाय) सन्तानाय (कः) (इभाय) हस्तिने (उत) अपि (राये) उत्तमश्रिये (अधि) अध्यक्षतया (ब्रवत्) ब्रूयात् (तन्वे) शरीराय (कः) (जनाय) प्रधानाय ॥१७॥

हे सेनापते ! सेनाओं में स्थित भृत्यों में (कः) कौन शत्रुओं को (ईषते) मारता है। (कः) कौन शत्रुओं से (तुज्यते) मारा जाता है (कः) कौन युद्ध में (बिभाय) भय को प्राप्त होता है (कः) कौन (सन्तम्) राजधर्म में वर्त्तमान (इन्द्रम्) उत्तम ऐश्वर्य के दाता को (मंसते) जानता है (कः) कौन (तोकाय) सन्तानों के (अन्ति) समीप में रहता है (कः) कौन (इभाय) हाथी के उत्तम होने के लिये शिक्षा करता है (उत) और (कः) कौन (राये) बहुत धन करने के लिये वर्त्तता और (तन्वे) शरीर और (जनाय) मनुष्यों के लिये (अधिब्रवंत्) आज्ञा देवे, इसका उत्तर आप कहिये ॥१७॥

 

अन्वयः-

हे सेनापते सेनास्थभृत्यानां मध्ये कः शत्रूनीषते कः शत्रुभिस्तुज्यते को युद्धे बिभाय कः सन्तमिन्द्रं मंसते कस्तोकायान्ति वर्त्तते कः इभाय शिक्षते उतापि को राये प्रवर्त्तेत कस्तन्वे जनाय चाधिब्रवदिति त्वं ब्रूहि ॥१७॥


 

भावार्थः-

ये दीर्घब्रह्मचर्येण सुशिक्षयान्यैः शुभैगुणैर्युक्तास्ते सर्वाण्येतानि कर्म्माणि कर्त्तुंशक्नुवन्ति नेतरे यथा राजा सेनापतिं प्रति सर्वां स्वसेनाभृत्यव्यवस्थां पृच्छेत् तथा सेनाध्यक्षः स्वाधीनान्नध्यक्षान् स्वयमेतां पृच्छेत् यथा राजा सेनापतिमाज्ञापयेत् तथा स्वयं सेनाध्यक्षान्नाज्ञापयेद् ॥१७॥

जो अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य, उत्तम शिक्षा और अन्य शुभगुणों से युक्त होते हैं, वे विजयादि कर्मों को कर सकते हैं। जैसे राजा सेनापति को सब अपनी सेना के नौकरों की व्यवस्था को पूछे वैसे सेनापति भी अपने अधीन छोटे सेनापतियों की स्वयं सब वार्त्ता पूछे। जैसे राजा सेनापति को आज्ञा देवे वैसे (सेनापति स्वयं) सेना के प्रधान पुरुषों को करने योग्य कर्म की आज्ञा देवे ॥१७॥

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