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Mantra Rig 01.084.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 7 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 93 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्य॑म् इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् इत्था चन्द्रमसो गृहे

 

The Mantra's transliteration in English

atrāha gor amanvata nāma tvaṣṭur apīcyam | itthā candramaso ghe ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अत्र॑ अह॑ गोः अ॒म॒न्व॒त॒ नाम॑ त्वष्टुः॑ अ॒पी॒च्य॑म् इ॒त्था च॒न्द्रम॑सः गृ॒हे

 

The Pada Paath - transliteration

atra | aha | go | amanvata | nāma | tvaṣṭu | apīcyam | itthā | candramasa | ghe ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।१५

मन्त्रविषयः-

अथ राज्ञः सूर्यवत्कृत्यमुपदिश्यते।

अब राजा का सूर्य के समान करने योग्य कर्म का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अत्र) अस्मिञ्जगति (अह) विनिग्रहे (गोः) पृथिव्याः (अमन्वत) मन्यन्ते (नाम) प्रसिद्धं रचनं नामकरणं वा (त्वष्टुः) मूर्तद्रव्यछेदकस्य (अपीच्यम्) येप्यञ्चन्ति प्राप्नुवन्ति तेषु साधुम् (इत्था) अनेन हेतुना (चन्द्रमसः) चन्द्रलोकादेः (गृहे) स्थाने ॥१५॥

हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे (अव) इस जगत् में (नाम) प्रसिद्ध (गौः) पृथिवी और (चन्द्रमसः) चन्द्रलोक के मध्य में (त्वष्टुः) छेदन करनेहारे सूर्य का (अपीच्यम्) प्राप्त होनेवालों में योग्य प्रकाशरूप व्यवहार है (इत्था) इसप्रकार (अमन्वत) मानते है वैसे (अह) निश्चय से जाके (गृहे) घरों में न्यायप्रकाशार्थ वर्त्तो ॥१५॥

 

अन्वयः-

हे राजादयो मनुष्या यूयं यथाऽत्रनाम गोश्चन्द्रमसस्त्वष्टुरपीच्यमस्तीत्थामन्वत तथाऽह न्यायप्रकाशाय प्रजागृहे वर्त्तध्वम् ॥१५॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्ज्ञातव्यामीश्वरविद्यावृद्ध्योर्हानिर्विपरीतता भवितुं न शक्या सर्वेषु कालेषु सर्वासु क्रियास्वेकरससृष्टिनियमा भवन्ति यथा सूर्यस्य पृथिव्या सहाकर्षणप्रकाशादिसम्बन्धाः सन्ति तथैवान्यभूगौलैः सह सन्ति। कुत ईश्वरेण संस्थापितस्य नियमस्य व्यभिचारो न भवति ॥१५॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि ईश्वर की विद्यावृद्धि की हानि और विपरीतता नहीं हो सकती। सब काल सब क्रियाओं में एकरस सृष्टि के नियम होते हैं। जैसे सूर्य का पृथिवी के साथ आकर्षण और प्रकाश आदि सम्बन्ध है वैसे ही अन्य भूगोलों के साथ। क्योंकि ईश्वर से स्थिर किये नियम का व्यभिचार अर्थात् भूल कभी नहीं होती ॥१५॥

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