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Mantra Rig 01.084.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 6 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 87 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- उष्णिक्

स्वर: (Swar) :- ऋषभः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति उ॒ग्रं तत्प॑त्यते॒ शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य सुतावाँ आविवासति उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग

 

The Mantra's transliteration in English

yaś cid dhi tvā bahubhya ā sutāvām̐ āvivāsati | ugra tat patyate śava indro aga ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यः चि॒त् हि त्वा॒ ब॒हुऽभ्यः॑ सु॒तऽवा॑न् आ॒ऽविवा॑सति उ॒ग्रम् तत् प॒त्य॒ते॒ शवः॑ इन्द्रः॑ अ॒ङ्ग

 

The Pada Paath - transliteration

ya | cit | hi | tvā | bahu-bhya | ā | suta-vān | āvivāsati | ugram | tat | patyate | śava | indra | aga ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।०९

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यः) (चित्) अपि (हि) खलु (त्वा) त्वाम् (बहुभ्यः) मनुष्येभ्यः (आ) समन्तात् (सुतावान्) प्रशस्तोत्पन्नपदार्थयुक्तः (आविवासति) समन्तात्परिचरति (उग्रम्) उत्कृष्टम् (तत्) (पत्यते) प्राप्यते (शवः) बलम् (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (अङ्ग) क्षिप्रकारी सर्वसुहृद् ॥९॥

हे (अङ्ग) मित्र ! तू जो (सुतावान्) अन्नादि पदार्थों से युक्त (इन्द्रः) परमैश्वर्य का प्रापक (बहुभ्यः) मनुष्यों से (त्वा) तुझको (आविवासति) सेवा करता है जो शत्रुओं का (उग्रम्) अत्यन्त (शवः) बल (तत्) उसको (चित्) भी (आपत्यते) प्राप्त होता है (तम्) (हि) उसीको राजा मानो ॥९॥

 

अन्वयः-

हे अङ्ग त्वं यः सुतावानिन्द्रो बहुभ्यस्त्वा त्वामा विवासति य उग्रं शवश्चित्तदा पत्यते तं हि खलु राजानं मन्यध्वम् ॥९॥

 

 

भावार्थः-

हे मनुष्या यूयं यः शत्रूणां बलं हत्वा युष्मान् दुःखेभ्यो वियोज्य सुखिनः कर्त्तुं शक्नोति यस्य भयपराक्रमाभ्यां शत्रवो निलीयन्ते तं किल सेनापतिं कृत्वानन्दत ॥९॥

हे मनुष्यो ! तुम लोग जो शत्रुओं के बल का हनन करके तुमको दुःखों से हटाकर सुखयुक्त करने को समर्थ हो तथा जिसके भय और पराक्रम से शत्रु नष्ट होते हैं उसे सेनापति करके आनन्द को प्राप्त होओ ॥९॥

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