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Mantra Rig 01.084.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 84 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 5 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 79 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृदनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

असा॑वि॒ सोम॑ इन्द्र ते॒ शवि॑ष्ठ धृष्ण॒वा ग॑हि त्वा॑ पृणक्त्विन्द्रि॒यं रज॒: सूर्यो॒ र॒श्मिभि॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि त्वा पृणक्त्विन्द्रियं रजः सूर्यो रश्मिभिः

 

The Mantra's transliteration in English

asāvi soma indra te śaviṣṭha dhṛṣṇav ā gahi | ā tvā pṛṇaktv indriya raja sūryo na raśmibhi ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

असा॑वि सोमः॑ इ॒न्द्र॒ ते॒ शवि॑ष्ठ धृ॒ष्णो॒ इति॑ ग॒हि॒ त्वा॒ पृ॒ण॒क्तु॒ इ॒न्द्रि॒यम् रजः॑ सू॒र्यः॑ र॒श्मिऽभिः॑

 

The Pada Paath - transliteration

asāvi | soma | indra | te | śaviṣṭha | dhṛṣṇo iti | ā | gahi | ā | tvā | pṛṇaktu | indriyam | raja | sūrya | na | raśmi-bhiḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८४।०१

मन्त्रविषयः-

पुनः सेनाध्यक्षकृत्यमुपदिश्यते।

अब चौरासीवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। इसके प्रथम मन्त्र में सेनापति के गुणों का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(असावि) उत्पाद्यते (सोमः) उत्तमोऽनेकविधरोगनाशक ओषधिरसः (इन्द्र) सर्वेश्यर्यप्राप्तिहेतो (ते) तुभ्यम् (शविष्ठ) बलिष्ठ (धृष्णो) प्रगल्भ (आ) आभिमुख्ये (गहि) प्राप्नुहि (आ) समन्तात् (त्वा) त्वाम् (पृणक्तु) संपर्कं करोतु (इन्द्रियम्) मनः (रजः) लोकसमूहम् (सूर्यः) सविता (न) इव (रश्मिभिः) किरणैः ॥१॥

हे (धृष्णो) प्रगल्भ (शविष्ठ) प्रशंसित बलयुक्त (इन्द्र) परमैश्वर्य देनेहारे सत्पुरुष ! (ते) तेरे लिये जो (सोमः) अनेक प्रकार के रोगों को विनाश करनेहारी औषधियों का सार हमने (आसावि) सिद्ध किया है, जो तेरी (इन्द्रियम्) इन्द्रियों को (सूर्यः) सविता (रश्मिभिः) किरणों से (रजः) लोकों का प्रकाश करने के (न) तुल्य प्रकाश करे उसको तू (आगहि) प्राप्त हों, वह (त्वा) तुझे, (आपृणक्तु) बल और आरोग्यता से युक्त करे ॥१॥

 

अन्वयः-

हे धृष्णोशविष्ठेन्द्र ते तुभ्यं यः सोमोस्माभिरसावि यस्ते तवेन्द्रियं सूर्यो रश्मिभी रजो नेव प्रकाशयेत्तं त्वमागहि समन्तात् प्राप्नुहि स च त्वा त्वामापृणक्तु ॥१॥


 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। प्रजासेनाशालासभास्थैः पुरुषैः सुपरीक्ष्य सूर्यसदृशं प्रजासेनाशालासभाध्यक्षं कृत्वा सर्वथा स सत्कर्त्तव्य एवं सभ्या अपि प्रतिष्ठापयितव्याः ॥१॥

इस मन्त्र में उपालङ्कार है। प्रजा, सेना और पाठशालाओं की सभाग्रों में स्थित पुरुषों को योग्य है कि अच्छे प्रकार सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष को प्रजा, सेना और पाठशालाओं में अध्यक्ष करके सब प्रकार से उसका सत्कार करना चाहिये वैसे सभ्यजनों की भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये ॥१॥

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