Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎sukta 083‎ > ‎

Mantra Rig 01.083.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 83 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 4 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 77 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ तत॒: सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे

 

The Mantra's transliteration in English

yajñair atharvā prathama pathas tate tata sūryo vratapā vena ājani | ā gā ājad uśanā kāvya sacā yamasya jātam amta yajāmahe ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

य॒ज्ञैः अथ॑र्वा प्र॒थ॒मः प॒थः त॒ते॒ ततः॑ सूर्यः॑ व्र॒त॒ऽपाः वे॒नः अ॒ज॒नि॒ गाः आ॒ज॒त् उ॒शना॑ क॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम् अ॒मृत॑म् य॒जा॒म॒हे॒

 

The Pada Paath - transliteration

yajñai | atharvā | prathama | patha | tate | tata | sūrya | vrata-pā | vena | ā | ajani | ā | gā | ājat | uśanā | kavya | sacā | yamasya | jātam | amtam | yajāmahe ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८३।०५

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते केन किं संगच्छन्त इत्युपदिश्यते।

फिर वे किससे किसको प्राप्त होते हैं, यह विषयकहा है।

 

पदार्थः-

(यज्ञैः) विद्याविज्ञानप्रचारैः (अथर्वा) अहिंसक (प्रथमः) प्रख्यातो विद्वान् (पथः) मार्गम् (तते) तनुते। अत्र बहुलं छन्दसीति विकरणस्य लुक्। (ततः) विस्तृतः। अत्र तनिमृङ्। उ० ३।८६। अनेन तन्प्रत्ययः किच्च। (सूर्यः) यथा सविता तथा (व्रतपाः) सत्यनियमरक्षकः (वेनः) कमनीयः (आ) अभितः (अजनि) जायते (आ) समन्तात् (गाः) पृथिवीः (आजत्) अजत्याकर्षणेन प्रक्षिपति वा (उशना) कामयिता (काव्यः) यथा कवेः पुत्रः शिष्यो वा (सचा) विज्ञानेन (यमस्य) सर्वनियन्तुः (जातम्) प्रसिद्धिगतम् (अमृतम्) अधर्मजन्मदुःखरहितम् मोक्षसुखम् (यजामहे) संगच्छामहे ॥

जैसे (प्रथमः) प्रसिद्ध विद्वान् (अथर्वा) हिंसारहित (पथः) सन्मार्ग को (तते) विस्तृत करता है जैसे (वेनः) बुद्धिमान् (व्रतपाः) सत्य का पालन करनेहारा सब प्रकार (आजनि) प्रसिद्ध होता है जैसे (ततः) विस्तृत (सूर्यः) सूर्यलोक (गाः) पृथिवी में देशों को (आजत्) धारण करके घुमाता है जैसे (काव्यः) कवियों में शिक्षा को प्राप्त (उशना) विद्या की कामना करनेवाला विद्वान् विद्याओं को प्राप्त होता है वैसे हम लोग (यज्ञैः) विद्या के पढ़ने-पढ़ाने सत्संयोगादि क्रियाओं से (यमस्य) सब जगत् के नियन्ता परमेश्वर के (सचा) साथ (जातम्) प्राप्त हुए (अमृतम्) मोक्ष को (आयजामहे) प्राप्त होवें

 

अन्वयः-

यथा प्रथमोऽथर्वापथस्तते यथा वेनो व्रतपा आजनि समन्ताज्जायते यथा ततः सूर्यो गा आजदजति यथा काव्य उशना विद्वान् विद्याः प्राप्नोति तथा वयं यज्ञैर्यमस्य सचा जातममृतमायजामहे

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदि मनुष्यैः सन्मार्गे स्थित्वा सत्क्रियाभिर्विज्ञानेन च परमेश्वरं विज्ञाय मोक्षसुखमिष्यते तर्ह्यवश्यं ते मुक्तिमश्नुवते  

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सत्य मार्ग में स्थित होके सत्य किया और विज्ञान से परमेश्वर को जानके मोक्ष की इच्छा करें, वे विद्वान् मुक्ति को प्राप्त होते हैं  

Comments