Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎sukta 083‎ > ‎

Mantra Rig 01.083.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 83 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 4 of Adhyaya 6 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 74 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

आपो॒ दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒वः प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रज॑: प्रा॒चैर्दे॒वास॒: प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒रा इ॑व

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

आपो देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः प्राचैर्देवासः प्र णयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव

 

The Mantra's transliteration in English

āpo na devīr upa yanti hotriyam ava paśyanti vitata yathā raja | prācair devāsa pra ayanti devayum brahmapriya joayante varā iva ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

आपः॑ दे॒वीः उप॑ य॒न्ति॒ हो॒त्रिय॑म् अ॒वः प॒श्य॒न्ति॒ विऽत॑तम् यथा॑ रजः॑ प्रा॒चैः दे॒वासः॑ प्र न॒य॒न्ति॒ दे॒व॒ऽयुम् ब्र॒ह्म॒ऽप्रिय॑म् जो॒ष॒य॒न्ते॒ व॒राःऽइ॑व

 

The Pada Paath - transliteration

āpa | na | devī | upa | yanti | hotriyam | ava | paśyanti | vi-tatam | yathā | raja | prācai | devāsa | pra | nayanti | deva-yum | brahma-priyam | joayante | varā-iva ||



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–०८३।०२

मन्त्रविषयः-

पुनर्विद्वांसः किं कुर्वन्तीत्युपदिश्यते।

फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(आपः) व्याप्तिशीलानि (न) इव (देवीः) देदीप्यमानाः (उप) सामीप्ये (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (होत्रियम्) दातव्यादातव्यानामिदम् (अवः) रक्षणादिकम् (पश्यन्ति) प्रेक्षन्ते (विततम्) विस्तृतम् (यथा) येन प्रकारेण (रजः) सूक्ष्म सर्वलोककारणं परमाण्वादिकम् (प्राचैः) प्राचीनैर्विद्वद्भिः (देवासः) प्रशस्ता विद्वांसः (प्र) (नयन्ति) प्राप्नुवन्ति (देवयुम्) आत्मानं देवमिच्छन्तम् (ब्रह्मप्रियम्) ईश्वरो वेदो वा प्रियो यस्य तम् (जोषयन्ते) प्रीतयन्ति (वराइव) यथा प्रशस्तविद्याधर्मकर्मस्वभावाः ॥२॥

जो (देवासः) विद्वान् लोग मेघ को (आपो न) जैसे जल प्राप्त होते हैं वैसे (देवीः) विदुषी स्त्रियों को (उपयन्ति) प्राप्त होते हैं और (यथा) जैसे (प्राचैः) प्राचीन विद्वानों के साथ (विततम्) विशाल और जैसे (रजः) परमाणु आदि जगत् का कारण (होत्रियम्) देने-लेने के योग्य (अवः) रक्षण को (पश्यन्ति) देखते हैं (वराइव) उत्तम पतिव्रता विद्वान् स्त्रियों के समान (ब्रह्मप्रियम्) वेद और ईश्वर की आज्ञा में प्रसन्न (देवयुम्) अपने आत्मा को विद्वान् होने की चाहनायुक्त (प्रणयन्ति) नीतिपूर्वक करते और (जोषयन्ते) इसका सेवन करते औरों को ऐसा कराते है वे निरन्तर सुखी क्यों न हों ॥२॥

 

अन्वयः-

ये देवासो मेघामापो न देवीरुपयन्ति तथा प्राचैः सह वितत रजो होत्रियमवः पश्यन्ति वराइव ब्रह्मप्रियं देवयुं प्रणयन्ति जोषयन्ते ते सततं सुखिनः कथं न स्युः ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। केन हेतुनेमे विद्वांस इमेऽविद्वांस इति विवेचनीयमित्यात्राह जलवच्छान्ता प्राणवत्प्रियाः धर्म्यादिदिव्यक्रियाः कुर्युः सर्वेषां शरीरात्मनोः यथार्थरक्षणं जानीयुः। भूगर्भादिविद्याभिः प्राचीनवेदविद्विद्वद्वर्त्तेरन् वेदद्वारेश्वरप्रणीतं धर्मं प्रचारयेयुस्ते विद्वांसो विज्ञेयाः एतद्विपरीताः स्युस्तेऽविद्वांसश्चेति निश्चिनुयुः ॥२॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। किस हेतु से विद्वान् और अविद्वान् भिन्न-भिन्न कहाते हैं, इसका उत्तर-जो धर्मयुक्त शुद्ध क्रियाओं को करें, सबके शरीर और आत्मा का यथावत् रक्षण करना जानें और भूगर्भादि विद्याओं से प्राचीन आप्त विद्वानों के तुल्य वेदद्वारा ईश्वरप्रणीत सत्यधर्म मार्ग का प्रचार करें वे विद्वान् हैं और जो इनसे विपरीत हों वे अविद्वान् है, इस प्रकार निश्चय से जानें ॥२॥

Comments