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Mantra Rig 01.076.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 76 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 24 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र॒जाव॑ता॒ वच॑सा॒ वह्नि॑रा॒सा च॑ हु॒वे नि च॑ सत्सी॒ह दे॒वैः वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं य॑जत्र बो॒धि प्र॑यन्तर्जनित॒र्वसू॑नाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्रजावता वचसा वह्निरासा हुवे नि सत्सीह देवैः वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूनाम्

 

The Mantra's transliteration in English

prajāvatā vacasā vahnir āsā ca huve ni ca satsīha devai | vei hotram uta potra yajatra bodhi prayantar janitar vasūnām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र॒जाव॑ता वच॑सा वह्निः॑ आ॒सा च॒ हु॒वे नि च॒ स॒त्सि॒ इ॒ह दे॒वैः वेषि॑ हो॒त्रम् उ॒त पो॒त्रम् य॒ज॒त्र॒ बो॒धि प्र॒ऽय॒न्तः॒ ज॒नि॒तः॒ वसू॑नाम्

 

The Pada Paath - transliteration

prajāvatā | vacasā | vahni | āsā | ā | ca | huve | ni | ca | satsi | iha | devai | vei | hotram | uta | potram | yajatra | bodhi | pra-yanta | janita | vasūnām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०७६।०४

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।

फिर विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

 

पदार्थः

(प्रजावता) प्रशस्ता प्रजा विद्यते यस्मिँस्तेन (वचसा) वचनेन (वह्निः) सुखानां प्रापकः (आसा) अस्यन्ते वर्णा येन तेन मुखेन (च) समुच्चये (हुवे) स्तुवे । अत्र बहुलं छन्दसीति संप्रसारणम् । (नि) नितराम् (च) पुनरर्थे (सत्सि) सभायाम् (इह) अस्मिन् संसारे (देवैः) दिव्यगुणैर्विद्वद्भिर्वा (वेषि) व्याप्नोषि (होत्रम्) हवनीयं वस्तु (उत) अपि (पोत्रम्) पवित्रकारम् (यजत्र) दातः (बोधि) जानीहि (प्रयन्तः) प्रकृष्टनियमकर्त्तः (जनितः) उत्पादकः (वसूनाम्) वासाधिकरणानाम् ॥४॥

हे (यजत्र) दाता ! (वह्निः) सुखों को प्राप्त करनेवाले तू (इह) इस संसार में (देवैः) विद्वानों के साथ (सत्सि) सभा में (प्रजावता) प्रजा की सम्मति के अनुकूल (वचसा) वचनों से (बोधि) बोध कराता है, जिससे (होत्रम्) हवन करने योग्य (च) और (पोत्रम्) पवित्र करनेवाले वस्तुओं को (उत) भी (नि) निरन्तर (वेषि) प्राप्त होता है, (जनितः) सुखोत्पन्न करनेवाले (प्रयन्तः) प्रयत्न से तू जैसे (वसूनाम्) पृथिव्यादि पदार्थों को जाननेवाला है, वैसे मैं (आसा) मुख से तेरी (च) अन्य विद्वानों की भी (आहुवे) स्तुति करता हूँ ॥४॥

 

अन्वयः

हे यजत्र ! यो वह्निस्त्वमिह देवैः सह सत्सि प्रजावता वचसा बोधि यतो होत्रमुत पोत्रं निवेषि । हे यजत्र ! प्रयन्तर्यथा त्वं वसूनां वेत्ताऽसि तथाऽहमासा त्वां हुवे ॥४॥

 

 

भावार्थः

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । मनुष्यैः परमेश्वरस्य धार्मिकाणां विदुषां च सहायेन पवित्रतां सम्पाद्य सर्वाणि श्रेष्ठानि प्राप्तव्यानि ॥४॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्य परमेश्वर और धार्मिक विद्वानों के सहाय और संग से शुद्धि को प्राप्त होकर सब श्रेष्ठ वस्तुओं को प्राप्त हों ॥४॥







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