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Mantra Rig 01.075.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 75 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 23 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 14 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत् अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत् अग्ने यक्षि स्वं दमम्

 

The Mantra's transliteration in English

yajā no mitrāvaruā yajā devām̐ tam bhat | agne yaki sva damam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यज॑ नः॒ मि॒त्रावरु॑णा यज॑ दे॒वान् ऋ॒तम् बृ॒हत् अग्ने॑ यक्षि॑ स्वम् दम॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

yaja | na | mitrāvaruā | yaja | devān | tam | bhat | agne | yaki | svam | damam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७५।०५

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यज) सङ्गमय। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (नः) अस्मभ्यम् (मित्रावरुणा) बलपराक्रमकारकौ प्राणोदानौ (यज) सङ्गच्छस्व (देवान्) दिव्यगुणान् भोगान् (ऋतम्) सत्यं विज्ञानम् (बृहत्) महाविद्यादिगुणयुक्तम् (अग्ने) विज्ञानयुक्त (यक्षि) यजसि। अत्र लडर्थे लुङ्। (स्वम्) स्वकीयम् (दमम्) दान्तस्वभावं गृहम् ॥५॥

हे (अग्ने) पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान्मनुष्य ! जिस कारण (स्वम्) आप अपने (दमम्) उत्तम स्वभावरूपी घर को (यक्षि) प्राप्त होते है, इसीसे (नः) हमारे लिये (मित्रावरुणा) बल और पराक्रम के करनेवाले प्राण और उदान को (यज) अरोग कीजिये (बृहत्) बड़े-बड़े विद्यादिगुणयुक्त (ऋतम्) सत्य विज्ञान को (यज) प्रकाशित कीजिये ॥५॥

 

अन्वयः-

हे अग्ने यतस्त्वं स्वं दमं यक्षि तस्मान्नो मित्रावरुणा यज बृहदृतं देवांश्च यज ॥५॥

 

 

भावार्थः-

यथा परमेश्वरस्य परोपकारन्यायादिशुभगुणदानस्वभावोऽस्ति तथैव विद्वद्भिरपि तादृक् स्वभावः कर्त्तव्यः ॥५॥

अत्रेश्वराग्निविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥

इति ७५ पञ्चसप्ततितमं सूक्तं २३ त्रयोविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥५॥  

जैसे परमेश्वर का परोपकार के लिये न्याय आदि शुभ गुण देने का स्वभाव है वैसे ही विद्वानों को भी अपना स्वभाव रखना चाहिये ॥५॥

इस सूक्त में ईश्वर, अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥

यह ७५ पचहत्तरवां सूक्त और २३ तेईसवां वर्ग पूरा हुआ ॥   

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