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Mantra Rig 01.075.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 75 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 23 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 10 of Anuvaak 13 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गोतमो राहूगणः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम् ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम् हव्या जुह्वान आसनि

 

The Mantra's transliteration in English

juasva saprathastama vaco devapsarastamam | havyā juhvāna āsani 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

जु॒षस्व॑ स॒प्रथः॑ऽतमम् वचः॑ दे॒वप्स॑रःऽतमम् ह॒व्या जुह्वा॑नः आ॒सनि॑

 

The Pada Paath - transliteration

juasva | sapratha-tamam | vaca | devapsara-tamam | havyā | juhvāna | āsani 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७५।०१

मन्त्रविषयः-

पुनर्विद्वान् कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते।

अब पचहत्तरवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् लोग कैसे हों, इस विषय का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(जुषस्व) (सप्रथस्तमम्) अतिशयेन विस्तारयुक्त व्यवहारम् (वचः) वचनम् (देवप्सरस्तमम्) देवैर्विद्वद्भिरतिशयेन ग्राह्यम् तम् (हव्या) अत्तुमर्हाणि (जुह्वानः) भुञ्जानः (आसनि) व्याप्त्याख्ये मुखे। अत्र पद्दन्नोमास०। अ० ६।१।६३। इति सूत्रेणासन्नादेशः ॥१॥

हे विद्वन् ! (आसनि) अपने सुख में (हव्या) भोजन करने योग्य पदार्थों को (जुह्वानः) खानेवाले आप जो विद्वानों का (सप्रथस्तमम्) अतिविस्तारयुक्त (देव्यप्सरस्तमम्) विद्वानों को अत्यन्त ग्रहण करने योग्य व्यवहार वा (वचः) वचन है (तम्) उसको (जुषस्व) सेवन करो ॥१॥

 

अन्वयः-

हे विद्वन्नासनि हव्या जुह्वानस्त्वं य विदुषां व्यवहारस्तं सप्रथस्तमं देवप्सरस्तमं वचश्च जुषस्व ॥१॥


 

भावार्थः-

ये मनुष्या युक्ताहारैर्ब्रह्मचारिणः स्युस्ते शरीरात्मसुखमाप्नुवन्तीति ॥१॥

जो मनुष्य युक्तिपूर्वक भोजन, मान और चेष्टाओं से युक्त ब्रह्मचारी हों, वे शरीर और आत्मा के सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥  

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