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Mantra Rig 01.073.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 73 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 20 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 90 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अर्व॑द्भिरग्ने॒ अर्व॑तो॒ नृभि॒र्नॄन्वी॒रैर्वी॒रान्व॑नुयामा॒ त्वोता॑: ई॒शा॒नास॑: पितृवि॒त्तस्य॑ रा॒यो वि सू॒रय॑: श॒तहि॑मा नो अश्युः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अर्वद्भिरग्ने अर्वतो नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्वनुयामा त्वोताः ईशानासः पितृवित्तस्य रायो वि सूरयः शतहिमा नो अश्युः

 

The Mantra's transliteration in English

arvadbhir agne arvato nbhir nn vīrair vīrān vanuyāmā tvotā | īśānāsa pitvittasya rāyo vi sūraya śatahimā no aśyu 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अर्व॑त्ऽभिः अ॒ग्ने॒ अर्व॑तः नृभिः॑ नॄन् वी॒रैः वी॒रान् व॒नु॒या॒म॒ त्वाऽऊ॑ताः ई॒शा॒नासः॑ पि॒तृ॒ऽवि॒त्तस्य॑ रा॒यः वि सू॒रयः॑ श॒तऽहि॑माः नः॒ अ॒श्युः॒

 

The Pada Paath - transliteration

arvat-bhi | agne | arvata | nbhi | nn vīrair vīrān vanuyāmā tvotā | īśānāsa | pit-vittasyar | ya | vi | sūraya | śata-himā | na | aśyuḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७३।०९

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कीदृशा भवेयुरित्युपदिश्यते।

फिर वे मनुष्य कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अर्वद्भिः) प्रशस्तैरश्वैः (अग्ने) सर्वसुखप्रापक (अर्वतः) अश्वान् (नृभिः) विद्यादिप्रशस्तगुणयुक्तैर्मनुष्यैः (नन्) विद्यासुशिक्षाधर्मयुक्तान्मनुष्यान् (वीरैः) शौर्य्यादियुक्तैः (वीरान्) शौर्यादिगुणयुक्तान् (वनुयाम्) इच्छेम याचेम (त्वोताः) त्वया कृतरक्षाः (ईशानासः) समर्थाः स्वामिनः (पितृवित्तस्य) जनकभुक्तस्य (रायः) धनस्य (वि) विशेषे (सूरयः) विद्वांसः (शतहिमाः) शतं हिमानि यासु समासु ताः (नः) अस्मान् (अश्युः) प्राप्नुयुः ॥९॥

हे (अग्ने) सब सुखों के प्राप्त करानेवाले परमेश्वर ! आपसे (त्वोताः) रक्षित हम लोग (अर्वद्भिः) प्रशंसा योग्य घोड़ों से (अर्वतः) घोड़ों को (नृभिः) विद्यादि श्रेष्ठगुणयुक्त मनुष्यों से (नन्) शिक्षा धर्म्मवाले मनुष्यों और (वीरैः) शौर्यादियुक्त शूरवीरों से (वीरान्) शूरता आदि गुणवाले शूरवीरों की प्राप्ति (वनुयाम) होने को चाहें और याचना करें। आपकी कृपा से (पितृवित्तस्य) पिता के भोगे हुए (रायः) धनके (ईशानासः) समर्थ स्वामी हम हों और (सूरयः) मेधावी विद्वान् (नः) हम लोगों को (शतहिमा) सौ हेमन्त ऋतु पर्यन्त (व्युश्युः) प्राप्त होते रहें ॥९॥

 

अन्वयः-

हे जगदीश्वर ! त्वोता वयमर्वद्भिरर्वतो नृभिर्न न्वीरैर्वीरान् वनुयाम। त्वत्कृपया पितृवित्तस्य राय ईशानासो भवेम सूरयो नोस्मान् शतहिमा व्यश्युः ॥९॥

 

 

भावार्थः-

नहि मनुष्यैरीश्वरगुणकर्मस्वभावानुकूलाचरेणन विनोत्तमा विद्याः पदार्थाश्च प्राप्तुं शक्यास्तस्मादेतन्नित्यं प्रेम्णानुष्ठातव्यम् ॥९॥

मनुष्य लोग ईश्वर के गुण, कर्म्म, स्वभाव के अनुकूल वर्त्तने और अपने पुरुषार्थ के विना उत्तमविद्या और पदार्थों के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे इसका सदा अनुष्ठान करना उचित है ॥९॥

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