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Mantra Rig 01.073.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 73 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 20 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 89 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यान्रा॒ये मर्ता॒न्त्सुषू॑दो अग्ने॒ ते स्या॑म म॒घवा॑नो व॒यं च॑ छा॒येव॒ विश्वं॒ भुव॑नं सिसक्ष्यापप्रि॒वान्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यान्राये मर्तान्त्सुषूदो अग्ने ते स्याम मघवानो वयं छायेव विश्वं भुवनं सिसक्ष्यापप्रिवान्रोदसी अन्तरिक्षम्

 

The Mantra's transliteration in English

yān rāye martān suūdo agne te syāma maghavāno vaya ca | chāyeva viśvam bhuvana sisaky āpaprivān rodasī antarikam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यान् रा॒ये म॒र्ता॑न् सुसू॑दः अ॒ग्ने॒ ते स्या॒म॒ म॒घऽवा॑नः व॒यम् च॒ छा॒याऽइ॑व विश्व॑म् भुव॑नम् सि॒स॒क्षि॒ आ॒प॒प्रि॒ऽवान् रोद॑सी॒ इति॑ अ॒न्तरि॑क्षम्

 

The Pada Paath - transliteration

yān | rāye | martān | susūda | agne | te | syāma | magha-vāna | vayam | ca | chāyāiva | viśvam | bhuvanam | sisaki | āpapri-vān | rodasī iti | antarikam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७३।०८

मन्त्रविषयः-

अथैतत्सृष्टिकर्त्तेश्वरः कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते।

फिर सृष्टिकर्त्ता ईश्वर कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यान्) उत्तमविद्यास्वभावान् (राये) धनाय (मर्त्तान्) मनुष्यान् (सुसूदः) क्षयशरीरादियुक्तान् (अग्ने) जगदीश्वर (ते) तव (स्याम) भवेम (मघवानः) प्रशस्तधनयुक्ताः (वयम्) पुरुषार्थिनः (च) समुच्चये (छायेव) यथा शरीरैः सह छाया वर्त्तते तथा (विश्वम्) अखिलम् (भुवनम्) जगत् (सिसक्षि) समवैति (आपप्रिवान्) सर्वतोव्याप्तवान् (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (अन्तरिक्षम्) आकाशम् ॥८॥

हे (अग्ने) जगदीश्वर ! जो आप (यान्) जिन (सुसूदः) क्षयवृद्धि धर्म्मयुक्त (मर्त्तान्) मनुष्यों को (राये) विद्यादि धन के लिये (सिसक्षि) संयुक्त करते हो (ते) वे (वयम्) हम लोग (मघवानः) प्रशंसा योग्य धनवाले (स्याम) होवें (च) और जो आप (छायेव) शरीरों की छाया के समान (विश्वम्) सब (भुवनम्) जगत् और (रोदसी) आकाश, पृथिवी और (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (आपप्रिवान्) पूर्ण करनेवाले हो, उन आपकी सब लोग उपासना करें ॥८॥

 

अन्वयः-

हे अग्ने जगदीश्वर ! यस्त्वं यान् सुसूदो मर्त्तानस्मान्नाये सिसक्षि ते वयं मघवानः स्याम यो भवान् छायेव विश्वं भुवनं रोदसी अन्तरिक्षं चापप्रिवान् व्याप्तवानसि तं सर्वे वयमुपास्महे ॥८॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। विद्वद्भिरीश्वरोपासनापुरुषार्थाभ्यां स्वयं विद्यादिधनवन्तो भूत्वा सर्वे मनुष्या विद्यादिधनवन्तः कार्याः ॥८॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की उपासना और अपने पुरुषार्थ से आप विद्यादि धनवाले होकर सब मनुष्यों को भी करें ॥८॥

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