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Mantra Rig 01.073.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 73 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 19 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 86 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वि पृक्षो॑ अग्ने म॒घवा॑नो अश्यु॒र्वि सू॒रयो॒ दद॑तो॒ विश्व॒मायु॑: स॒नेम॒ वाजं॑ समि॒थेष्व॒र्यो भा॒गं दे॒वेषु॒ श्रव॑से॒ दधा॑नाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वि पृक्षो अग्ने मघवानो अश्युर्वि सूरयो ददतो विश्वमायुः सनेम वाजं समिथेष्वर्यो भागं देवेषु श्रवसे दधानाः

 

The Mantra's transliteration in English

vi pko agne maghavāno aśyur vi sūrayo dadato viśvam āyu | sanema vāja samithev aryo bhāga deveu śravase dadhānā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वि पृक्षः॑ अ॒ग्ने॒ म॒घऽवा॑नः अश्युः॑ वि सू॒रयः॑ दद॑तः विश्व॑म् आयुः॑ स॒नेम॑ वाज॑म् स॒म्ऽइ॒थेषु॑ अ॒र्यः भा॒गम् दे॒वेषु॑ श्रव॑से दधा॑नाः

 

The Pada Paath - transliteration

vi | pka | agne | magha-vāna | aśyu | vi | sūraya | dadata | viśvam | āyu | sanema | vājam | sam-itheu | arya | bhāgam | deveu | śravase | dadhānāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७३।०

मन्त्रविषयः-

तत्कृपासंगाभ्यां सह मनुष्यैः किं किं प्राप्यत इत्युपदिश्यते।

परमेश्वर की और विद्वानों के सङ्ग से मनुष्यों को क्या-क्या प्राप्त होता है, यह विषय कहा है।

 

पदार्थः-

(वि) विशेषे (पृक्षः) अत्युत्तमान्यन्नानि (अग्ने) सुखरूपविद्वन् (मघवानः) सत्कृतधनाः (अश्युः) भुञ्जते (वि) विशेषार्थ (सूरयः) मेधाविनः (ददतः) दानशीलाः (विश्वम्) अखिलम् (आयुः) जीवनं प्राप्तव्यं वस्तु वा (सनेम) संभजेम (वाजम्) विज्ञानम् (समिथेषु) संग्रामेषु। समिथे इति संग्राम ना०। निघं० २।१७। (अर्य्यः) स्वामी वणिग् जनो वा। (भागम्) भागसमूहम् (देवेषु) विद्वत्सु दिव्यगुणेषु वा (श्रवसे) श्रूयते येन यशसा तस्मै (दधानाः) धरन्तः ॥

हे (अग्ने) सुखस्वरूप विद्वान् ! आपके उपदेश से जैसे (अर्य्यः) स्वामी वा वैश्य (भागम्) सेवनीय पदार्थों के समान (मघवानः) सत्कारयुक्त धनवाले (ददतः) दानशील (सूरयः) मेधावी लोग (समिथेषु) संग्रामों तथा (देवेषु) विद्वान् वा दिव्यगुणों में (वाजम्) विज्ञान को (दधानाः) धारण करते हुए (श्रवसे) श्रवण करने योग्य कीर्त्ति के लिये (पृक्षः) अत्युत्तम अन्न और (विश्वम्) सब (आयुः) जीवन को (व्यश्युः) विशेष करके भोगें वा (विसनेम) विशेष करके सेवन करें वैसे हम भी किया करें ॥

 

अन्वयः-

हे अग्ने ! यथाऽर्यो भागं मघवानो ददतः सूरयः समिथेषु देवेषु वाजं दधानाः श्रवसे पृक्षो विश्वमायुश्च व्यश्यु स्तथा वयमपि विसनेम ॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैरीश्वरविद्वत्सहायपुरुषार्थाभ्यां सर्वाणि सुखानि प्राप्यन्ते नान्यथेति ॥॥ 

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य ईश्वर और विद्वानों के सहाय और अपने पुरुषार्थ से सब सुखों को प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं ॥॥ 

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